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Thursday, June 15, 2017

केजरीवाल को साथ बैठाने को सोनिया तैयार नहीं

धोबी का कुत्ता घर का ना घाट का  । माफ कीजिएगा लेकिन ये सच  है कि आम आदमी पार्टी की हालत इस वक्त कुछ ऐसी ही है । देश की सियासत में पहली बार ऐसा देख रहा हूं कि राष्ट्रपति के चुनाव में  जहां हर एक सांसद और विधायक का वोट महत्वपूर्ण होता है, फिर भी लोग केजरीवाल को अपने साथ बैठाने के लिए तैयार नहीं है । हालत ये हो गई है कि विपक्ष की जमात में जगह बनाने के लिए बेचारे केजरीवाल विपक्ष के ही दूसरे नेताओं के घर के चक्कर काट रहे हैं। 


राष्ट्रपति के चुनाव में विपक्षी एकजुटता के प्रयास शुरू हो गए है। सोनिया गांधी ने कल ही एक बैठक भी की । इस बैठक में सभी महत्वपूर्ण नेता मौजूद थे, लेकिन केजरीवाल को इस बैठक से दूर रखा गया। जबकि केजरीवाल के पास दिल्ली और पंजाब में अच्छी संख्या में विधायक है और सांसद भी हैं। ऐसे में केजरीवाल चुनाव में एक अहम भूमिका निभा सकते हैं। इधर खुद केजरीवाल भी विपक्ष के कई नेताओं के धर जा चुके हैं और खुद ही आँफर कर रहे हैं कि वो भी विपक्ष के उम्मीदवार को समर्थन देने को तैयार है। उन्होंने यहां तक कहा कि उनकी कोई शर्त भी नहीं है। शरद यादव जैसे बड़े नेता ने उनकी बात को सोनियां गांधी तक पहुंचाई भी, लेकिन सोनिया किसी कीमत पर केजरीवाल को अपने बगल में बैठाने के लिए तैयार नहीं हैं। 


केजरीवाल से ज्यादातर नेताओं की नाराजगी की ठोस वजह भी है। दरअसल केजरीवाल सभी राजनीतिक दलों को गाली देते रहे हैं, नेताओं के परिवारीजनों के खिलाफ बिना ठोस सुबूत के गंभीर आरोप लगाते रहे हैं। जबकि अब खुलासा हो गया है कि उन्होने गलत तरीके से अपने सगे साढू को ठेका दिलवाकर फायदा पहुंचाया।  इस मामले में जांच भी शुरू हो गई है। दूसरा आम आदमी पार्टी के नेताओं पर चरित्रहीनता के आरोप हैं। एक मंत्री को इसी लिए हटाया गया क्योंकि वो राशन कार्ड बनाने के नाम पर महिलाओं का शोषण कर रहा था फिर आप नेताओं पर आरोप है कि उन्होने पंजाब चुनाव के दौरान महिलाओं का यौनशोषण किया। लिहाजा ऐसे गंभीर आरोपों से घिरे पार्टी के नेताओं से विपक्ष खासतौर पर सोनिया गांधी दूरी बनाए रखना चाहती हैं। 

इतना ही नहीं इन दिनों आम आदमी पार्टी में जो कुछ चल रहा है उससे विश्वास के साथ ये कहना भी मुश्किल है कि केजरीवाल के इच्छानुसार उनके विधायक और सांसद वोट देंगे ही। कपिल मिश्रा ने जिस तरह से एक के बाद एक तमाम खुलासे किए हैं, उससे अब पार्टी में उनकी स्थिति कमजोर हुई है । खासतौर पर केजरीवाल के साढू को जिस तरह से फायदा पहुंचाया गया है, उसके बाद पार्टी में उनकी हनक कमजोर हुई है। इसी तरह कुमार विश्वास की पार्टी में एक मजबूत स्थिति है, इस समय केजरीवाल और विश्वास में भी 36 का आँकडा है। दो दिन पहले पार्टी प्रवक्ता दिलीप पांडेय से केजरीवाल ने जो बयान दिलवाया उससे भी पार्टी टूट के कगार है। लिहाजा अब किसी भी हाल में सोनिया गांधी तो केजरीवाल को अपने साथ बैठाने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं है । 




Thursday, June 14, 2012

खत्म होगा ममता का खेल ....

ममता बनर्जी का खेल खत्म होने वाला है। ममता की राजनीति को अगर आप थोडा भी समझते हैं तो आपको पता होना चाहिए कि ये अविश्वसनीय, अड़ियल और जिद्दी है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को इन्होंने खून के आंसू रोने पर मजबूर कर दिया था। ममता वही है, हां अटल जैसे स्वाभिमानी मनमोहन सिंह नहीं हैं, ये अपनी जब तक पूरी किरकिरी और थू थू नहीं करा लेंगे, कुर्सी छोड़ने वाले नहीं है। वरना तो जिस तरह से इनका नाम मुलायम और ममता ने राष्ट्रपति पद के लिए लिया है, उससे साफ हो गया है कि आप यूपीए गठबंधन के निर्विवाद नेता नहीं रहे। लिहाजा आपको सरकार और देशहित में तुरंत कुर्सी छोड़कर अपने स्वास्थ्य पर ध्यान देना चाहिए। खैर मनमोहन से ऐसे आदर्श की उम्मीद करना बैल से दुहना जैसा है।

खैर अब ममता की मुसीबत बढ़ने वाली है। वो कहने है ना ......... घर का ना घाट का। वैसी ही स्थिति बनने होने जा रही है ममता की। ममता की आज तक किसी से नहीं बनी है, तो भला मुलायम सिंह यादव से कितनी देर बनी रहेगी। ममता कभी भी सोच समझ कर ठंडे दिमाग से फैसला नहीं करती हैं। उनका  राजनीतिक मान मर्यादा से कोई सरोकार नहीं है। उनके लिए राष्ट्रपति का चुनाव और ग्राम प्रधान के चुनाव में कोई अंतर नहीं है। इस बार ममता मुलायम को समझने में धोखा खा रही है। उन्हें पता होना चाहिए कि मुलायम की आय से अधिक संपत्ति के मामले में बहुत फुरे फंसे हुए हैं, यही वजह है कि न्यूक्लीयर डील के दौरान जब यूपीए 1 से वामपंथियों ने सरकार से समर्थन वापस लिया था, तो मुलायम झट से 10 जनपथ पहुंच गए और सरकार को समर्थन का ऐलान कर दिया। जबकि सबको पता है कि वामपंथियों से समाजवादी पार्टी के बहुत अच्छे रिश्ते थे। ये बात जानते हुए भी ममता ने मुलायम पर भरोसा किया है, जल्दी उन्हें मुलायम की हकीकत की जानकारी हो जाएगी।

सच ये है कि कांग्रेस को मुलायम की जरूरत है, उतना ही सच ये भी है कि मुलायम को कांग्रेस की कहीं ज्यादा जरूरत है। मुलायम के खिलाफ सीबीआई में आय से अधिक संपत्ति का मामला अभी भी विचाराधीन है और इसमें मुलायम सिंह बहुत बुरी तरह फंसे हुए हैं। ऐसे में मुलायम नहीं चाहेंगे कि उनकी छीछालेदर हो। ये डर उन्हें काफी समय से बना हुआ है, यही वजह है कि यूपीए वन को भी उन्होंने समर्थन दिया था, ये समर्थन उस समय भी जारी था, जब केंद्र सरकार समाजवादी पार्टी की कोई भी मांग मानने को तैयार नहीं थी। अभी भी मुलायम सिंह सरकार को बिना शर्त समर्थन दे रहे हैं। पर ताजा हालात जो बन रहे हैं, उससे लगता है कि अब कांग्रेस ममता को किनारे लगाएगी और मुलायम को सरकार के अंदर लाने की पूरी कोशिश होगी। इतना नहीं मुलायम को कुछ अच्छे मंत्रालयों की भी पेशकश की जा सकती है। बहरहाल मामले चल रहे हैं, अभी कुछ भी अंतिम नहीं हो सकता है, पर ममता की मुश्किल जरूर बढने वाली है।