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Sunday, December 29, 2013

वाड्रा को बेईमान बता कर बने मुख्यमंत्री !

आज बिना लाग लपेट के एक सवाल  कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से पूछना चाहता हूं। मैंडम सोनिया जी, आप बताइये कि क्या कोई कांग्रेसी आपके दामाद राबर्ट वाड्रा को बेईमान और भ्रष्ट कह कर पार्टी में बना रह सकता है ? मैं जानता हूं कि इसका जवाब आप भले ना दें, लेकिन सच्चाई ये है कि अगर किसी नेता ने राबर्ट का नाम भी अपनी जुबान पर लाया तो उसे पार्टी से बिना देरी बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा। अब मैं फिर पूछता हूं कि आखिर आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल को मुख्यमंत्री बनाने के लिए ये कांग्रेस उनके पीछे कैसे खड़ी हो गई, जिसने आपके दामाद वाड्रा को सरेआम भ्रष्ट और बेईमान बताया। क्या ये माना जाए कि केजरीवाल ने जितने भी आरोप आपके परिवार और पार्टी पर लगाएं है, वो सही हैं, इसलिए आपकी पार्टी उनके साथ खड़ी हैं, या फिर पार्टी में कहीं कई विचार पनप रहे हैं,  लेकिन सही फैसला लेने में मुश्किल आ रही है और आपका बीमार नेतृत्व पार्टी को अपाहिज  बना रहा है।  

खैर सच तो ये है कि आम आदमी पार्टी को समर्थन देना अब कांग्रेस के गले की फांस बन गई है। मेरी नजर में तो आप को समर्थन देकर कांग्रेस ने एक ऐसी राजनीतिक भूल की है, जिसकी भरपाई संभव ही नहीं है। सबको पता ही है किसी भी राजनीतिक दल को दिल्ली की जनता ने बहुमत नहीं दिया, लिहाजा लोग सरकार बनाने की पहल ना करते और ना ही किसी को समर्थन का ऐलान करते ! लेकिन कांग्रेस के मूर्ख सलाहकारों को लगा कि अगर वो आप को समर्थन का ऐलान करती है, तो ऐसा करके वो दिल्ली की जनता के दिल मे जगह बना लेगी और केजरीवाल जनता से किए वादे पूरे नहीं कर पाएंगे, लिहाजा वो जनता का विश्वास खो देंगे। इससे सांप भी मर जाएगा और लाठी भी नहीं टूटेगी। इधर पहले तो केजरीवाल समर्थन लेने से इनकार करते रहे और कहाकि वो किसी के समर्थन से सरकार नहीं बनाएंगे। इस पर कांग्रेसी दो कदम आगे आ गए और कहने लगे की उनका समर्थन बिना शर्त है, सरकार बनाकर दिखाएं। 

अब कांग्रेसियों की करतूतों से केजरीवाल क्या देश की जनता वाकिफ है, सब जानते हैं कि इन पर आसानी से भरोसा करना मूर्खता है। लिहाजा केजरीवाल ने ऐलान किया कि वो जनता से पूछ कर इसका फैसला करेंगे। इस ऐलान के साथ केजरीवाल दिल्ली की जनता के बीच निकल गए, और जनता की सभा में उन्होंने आक्रामक तेवर अपनाया। हर सभा में ऐलान करते रहे कि सरकार बनाते ही सबसे पहला काम भ्रष्टाचार की जांच कराएंगे और दोषी हुई तो शीला दीक्षित तक को जेल भेजेंगे। आप पार्टी ने कांग्रेस पर हमला जारी रखा, लेकिन कांग्रेस को लग रहा था कि वो केजरीवाल को बेनकाब कर देंगे, इसलिए समर्थन देने के फैसले पर अडिग रहे। मैने तो पहली दफा देखा कि जिसके समर्थन से कोई दल सरकार बनाने जा रहा है वो उसके नेताओं को गाली सरेआम गाली दे रहा है और पार्टी कह रही है कि नहीं सब ठीक है। वैसे अंदर की बात तो ये भी है कांग्रेस में एक तपका ऐसा है जो पूर्व  मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का विरोधी है, उसे लग रहा है कि केजरीवाल जब जांच पड़ताल शुरू करेंगे तो शीला की असलियत सामने आ जाएगी।

केजरीवाल ने शपथ लेने से पहले कांग्रेस को इतना घेर दिया है कि अब उनके पास कोई चारा नहीं बचा। शपथ लेने के दौरान भी केजरीवाल ने साफ कर दिया कि वो किसी से समर्थन की गुजारिश नहीं करेंगे। बहुमत मिला तो सरकार चला कर जनता की सेवा वरना जनता के बीच रहकर उसकी सेवा। अब कांग्रेस के गले मे ये हड्डी ऐसी फंसी है कि ना उगलते बन रहा है ना ही निगलते बन रहा है। अगर कांग्रेस समर्थन वापसी का ऐलान करती है तो उसकी दिल्ली में भारी फजीहत का सामना करना पड़ सकता है। बता रहे हैं कि इस सामान्य मसले को पेंचीदा बनाने के बाद अब कांग्रेसी 10 जनपथ की ओर देख रहे हैं। अब ऐसा भी नहीं है कि 10 जनपथ में तमाम जानकार बैठे हैं, जो मुद्दे का हल निकाल देंगे। बहरहाल शपथग्रहण के बाद से जो माहौल बना है, उससे दो बातें सामने हैं। एक तो दिल्ली में कांग्रेस का पत्ता साफ हो जाएगा, दूसरा दिल्ली में आराजक राजनीति की शुरुआत  हो गई है। 

वैसे आप कहेंगे कि सोनिया गांधी से सवाल पूछना आसान है, लेकिन किसी मुद्दे का समाधान देना मुश्किल है। मैं समाधान दे रहा हूं। एक टीवी  न्यूज चैनल के स्टिंग आँपरेशन में पार्टी के पांच विधायकों ने पार्टी लाइन से अलग हट कर बयान दिया और केजरीवाल को  पागल तक बताया। कांग्रेस आलाकमान को इस मामले को तत्काल गंभीरता से लेते हुए अपने पांचो विधायकों को पार्टी से निलंबित कर उनकी प्राथमिक सदस्यता समाप्त कर देनी चाहिए। इससे दिल्ली की जनता में ये संदेश जाएगा कि पार्टी लाइन के खिलाफ जाकर अरविंद की आलोचना करने पर इन विधायकों के खिलाफ कार्रवाई की गई है। उधर विधायक दल बदल कानून के दायरे से बाहर हो जाएंगे। अब ये रिस्क तो रहेगा ही कि कहीं विधायक बीजेपी में शामिल  होकर उनकी सरकार ना बनवा दें ? अगर ऐसा होता भी है तो हर्षवर्धन के मुकाबले अरविंद कांग्रेस को कहीं ज्यादा नुकसान पहुंचाएंगे। कुछ मिलाकर दिल्ली में एक सभ्य तरीके से राजनीति होती तो हम देख सकेंगे। 


   

Sunday, May 26, 2013

अजित जोगी : मुख्यमंत्री बनने की ऐसी जल्दबाजी !

देश के अलग-अलग हिस्सों में नक्सली हमला होता रहा है, इसमें सुरक्षा बलों के साथ ही बड़ी संख्या में आम आदमी भी अपनी जान गवां चुके हैं। देखा जा रहा था कि नक्सलियों ने आज तक कभी भी किसी राजनीतिक को अपना निशाना नहीं बनाया था। इसलिए जब रात में खबर आई कि छत्तीसगढ़ में नक्सलियों ने कांग्रेस की "परिवर्तन यात्रा" को निशाना बनाकर हमला किया और इसमें कुछ बड़े नेताओं के साथ ही कांग्रेस कार्यकर्ताओं की मौत हो गई। ये खबर सभी के लिए चौंकाने वाली थी। इस खबर की जानकारी जैसे ही मुख्यमंत्री रमन सिंह को हुई, उन्होंने अपनी विकास यात्रा रद्द की और मुख्यालय रायपुर वापस आ गए। प्रधानमंत्री ने मुख्यमंत्री से बात की, उन्हें भरोसा दिलाया कि केंद्र से हर संभव मदद की जाएगी। सोनिया गांधी ने इस हमले को लोकतंत्र पर हमला बताया, बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने हमले की निंदा की और कहाकि इस पर दलगत राजनीति ऊपर उठकर ठोस पहल करने की जरूरत है। कांग्रेस के युवा नेता राहुल गांधी रात डेढ़ बजे ही रायपुर पहुंच कर घायलों से मुलाकात की और उनकी परेशानी को बांटने की कोशिश की। इन सबके बीच कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री अजित जोगी को यहां भी सियासत सूझ रही थी और वो हमले की खबर मिलते ही सबसे पहले उन्होंने मुख्यमंत्री का इस्तीफा मांगा। इतना ही नहीं देर रात में ही वो कुछ लोगों के साथ राजभवन पहुंच गए और राज्यपाल से कहा कि दो मिनट में इस सरकार को बर्खास्त करने की सिफारिश केंद्र को भेजें।

वैसे तो नक्सलियों का ये हमला कल शाम लगभग साढ़े चार बजे के करीब हुआ, लेकिन न्यूज चैनलों पर ये खबर करीब साढ़े आठ बजे आई। इस दौरान लगभग सभी न्यूज चैनल बीसीसीआई अध्यक्ष एन श्रीनिवासन पर राशन पानी लेकर चढ़े हुए थे। खबरिया चैनलों का एजेंडा था कि श्रीनिवासन का इस्तीफा लेकर रहेंगे, जबकि श्रीनिवासन को बीसीसीआई में अपने चंपू सदस्यों पर पूरा भरोसा है कि वो किसी भी सूरत में उनका साथ नहीं छोड़ने वाले हैं, तो भला वो इस्तीफा क्यों दें ? खैर नक्सली हमले के बाद अगर किसी ने सबसे ज्यादा राहत की सांस ली होगी तो वो हैं, एन श्रीनिवासन ! वजह और कुछ नहीं, बस कई दिन से खबरिया चैनल टीवी स्क्रिन पर उनकी तस्वीर लगाकर रोजाना नए-नए आरोप जड़ते जा रहे थे। लेकिन इस हमले के बाद सभी टीवी स्क्रिन से उनकी तस्वीर एक झटके में उतर गई। जाहिर है उन्होंने रात में अच्छी नींद ली होगी, क्योंकि उन्हें पता है कि अब उनकी तस्वीर एक बार उतर गई है तो दोबारा चढ़ने में टाइम लगेगा। 

खैर मुद्दे पर वापस आते हैं। छत्तीसगढ़ में नक्सली हमले की जितनी निंदा की जाए वो कम है। अच्छा इसे किसी एक राज्य का विषय बताना हकीकत से मुंह छिपाना है। सच्चाई ये है कि आज उग्रवादियों से कहीं ज्यादा खतरनाक हो गए हैं ये नक्सली। सही तो ये है कि अगर इन्हें आतंकवादी कहा जाए तो गलत नहीं होगा। छत्तीसगढ़ में इस नक्सली हमले के बाद मेरे एक पत्रकार मित्र का फोन आया, उनके तमाम मित्र उसी राज्य के निवासी हैं। बताने लगे कि यहां लगभग 30 से 40 लोगों की मौत हुई है, ये बहुत बड़ी घटना है। मैं भी अपने संपर्कों को कुरेदने लगा। इस दौरान चैनलों की खबरें भी देखता रहा। सबसे ज्यादा हैरानी मुझे पूर्व मुख्यमंत्री अजित जोगी की करतूतों को देखकर हुई। मैं देख रहा हूं कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तो लगातार मुख्यमंत्री रमन सिंह से बात कर उन्हें पूरी मदद का भरोसा दिला रहे हैं। मुख्यमंत्री केबिनेट की बैठक कर पुलिस अधिकारियों को निर्देश दे रहे हैं कि घायलों को जल्द से जल्द अस्पताल पहुंचाया जाए। जो नेता नक्सलियों के कब्जे में हैं, उन्हें हर हाल में छुड़ाने की कोशिश की जाए। सोनिया गांधी समेत तमाम कांग्रेस के नेता संयम से बोल रहे थे, उन्हें पता है कि ये समय राजनीति करने का नहीं है। लेकिन इन सबके उलट अजित जोगी रात में सियासत की गोटी फिट करने में जुट गए।

चैनलों पर जोगी की जो हालत रात में देगी गई, उससे लगा कि वो मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए कितने बेचैन और भूखे हैं। उन्हें ये फिक्र बिल्कुल नहीं थी कि इस नक्सली हमले में उनकी पार्टी के घायल साथियों की तबियत कैसी है, उनका इलाज कैसा चल रहा है। जंगल में फंसे लोगों को कैसे सुरक्षित स्थान तक पहुंचाया जाए ? उन्होंने तो मीडिया को देखते ही सबसे पहले मुख्यमंत्री रमन सिंह का इस्तीफा मांग लिया। कहाकि अब रमन सिंह सूबे का मुख्यमंत्री बने रहने का कोई हक नहीं है। इल्जाम लगाया कि उन्होंने अपनी विकास यात्रा में पूरी सुरक्षा झोंक दी, जबकि कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा में कोई सुरक्षा नहीं दी गई। जोगी कि इस बात में दम हो सकता है कि कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा में सुरक्षा की पुख्ता व्यवस्था ना रही हो, लेकिन मैं जोगी कि जल्दबाजी से आहत था। उन्होंने रात में ही तीन बातें कहीं ।

1. रमन सिंह तत्काल इस्तीफा दें, ना दें तो बर्खास्त किया जाए। 
2. परिवर्तन यात्रा जारी रहेगी, हम डरने वाले नहीं है। 
3. रविवार को छत्तीसगढ़ बंद रहेगा। 

भाई जोगी जी आपसे सवाल है, आप रमन सरकार को बर्खास्त करने की मांग को लेकर रात में ही राजभवन पहुंच गए। कैमरे पर भावुक होने का "ड्रामा" भी करते रहे। लेकिन आप पार्टी की यात्रा को लेकर इतने ही गंभीर थे, तो आज आपको सुबह ही वहां पहुंच कर यात्रा की कमान संभाल लेनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा आपने नहीं किया। क्या सिर्फ बड़ी-बड़ी बातें भर करते हैं या उस पर अमल करने का प्रयास भी। वैसे मैं भी देखना चाहता था कि आज आप परिवर्तन यात्रा लेकर आगे बढ़ते हैं तो आपके साथ आपकी पार्टी खड़ी होती भी है या नहीं। लेकिन आप खुद ही गायब  हो गए। छत्तीसगढ़ को बंद करने आह्वान किया है, उसके लिए भी आप ने बस चैनलों पर बोलकर चुप हो गए। अच्छा कल रात तक तो आप बहुत बक-बक कर रहे थे, लेकिन रविवार को आपकी चुप्पी सूबे की जनता को समझ में नहीं आ रही है। वैसे जोगी जी आप काफी समय तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे हैं, कहा तो यहां तक जा रहा है, नक्सलियों के आप से भी बहुत अच्छे संबंध हैं। फिर आप तो हमले के घंटे भर पहले इस काफिले में खुद भी मौजूद थे, अचानक आप वहां से वापस आ गए। बहरहाल जोगी की जल्दबाजी देखकर जरूरी तो ये भी है उनकी भूमिका की भी अच्छी तरह से जांच होनी चाहिए। 

वैसे हमले की वजह जो पहली नजर में सामने आ रही है, उससे तो यही लगता है कि कांग्रेस के दिग्गज नेता महेन्द्र कर्मा जो छत्तीसगढ में नेता विपक्ष भी थे। उन्होंने नक्सलियों के खिलाफ सलवा जुडूम आंदोलन की शुरुआत की, इसके बाद भी वो नक्सलियों के निशाने पर थे। माना जा रहा है कि ये हमला भी महेन्द्र कर्मा की ही हत्या के लिए था, लेकिन हमले में और लोग भी मारे गए। नक्सलियों ने जिस तरह से उनके शरीर पर पूरी मैग्जीन खाली कर दी  है, इससे उनके गुस्से का अंदाजा लगाया जा सकता है। बहरहाल जोगी की जल्दबादी ने राजनीतिक बेशर्मी को उजागर कर दिया।  







  

Thursday, June 14, 2012

खत्म होगा ममता का खेल ....

ममता बनर्जी का खेल खत्म होने वाला है। ममता की राजनीति को अगर आप थोडा भी समझते हैं तो आपको पता होना चाहिए कि ये अविश्वसनीय, अड़ियल और जिद्दी है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को इन्होंने खून के आंसू रोने पर मजबूर कर दिया था। ममता वही है, हां अटल जैसे स्वाभिमानी मनमोहन सिंह नहीं हैं, ये अपनी जब तक पूरी किरकिरी और थू थू नहीं करा लेंगे, कुर्सी छोड़ने वाले नहीं है। वरना तो जिस तरह से इनका नाम मुलायम और ममता ने राष्ट्रपति पद के लिए लिया है, उससे साफ हो गया है कि आप यूपीए गठबंधन के निर्विवाद नेता नहीं रहे। लिहाजा आपको सरकार और देशहित में तुरंत कुर्सी छोड़कर अपने स्वास्थ्य पर ध्यान देना चाहिए। खैर मनमोहन से ऐसे आदर्श की उम्मीद करना बैल से दुहना जैसा है।

खैर अब ममता की मुसीबत बढ़ने वाली है। वो कहने है ना ......... घर का ना घाट का। वैसी ही स्थिति बनने होने जा रही है ममता की। ममता की आज तक किसी से नहीं बनी है, तो भला मुलायम सिंह यादव से कितनी देर बनी रहेगी। ममता कभी भी सोच समझ कर ठंडे दिमाग से फैसला नहीं करती हैं। उनका  राजनीतिक मान मर्यादा से कोई सरोकार नहीं है। उनके लिए राष्ट्रपति का चुनाव और ग्राम प्रधान के चुनाव में कोई अंतर नहीं है। इस बार ममता मुलायम को समझने में धोखा खा रही है। उन्हें पता होना चाहिए कि मुलायम की आय से अधिक संपत्ति के मामले में बहुत फुरे फंसे हुए हैं, यही वजह है कि न्यूक्लीयर डील के दौरान जब यूपीए 1 से वामपंथियों ने सरकार से समर्थन वापस लिया था, तो मुलायम झट से 10 जनपथ पहुंच गए और सरकार को समर्थन का ऐलान कर दिया। जबकि सबको पता है कि वामपंथियों से समाजवादी पार्टी के बहुत अच्छे रिश्ते थे। ये बात जानते हुए भी ममता ने मुलायम पर भरोसा किया है, जल्दी उन्हें मुलायम की हकीकत की जानकारी हो जाएगी।

सच ये है कि कांग्रेस को मुलायम की जरूरत है, उतना ही सच ये भी है कि मुलायम को कांग्रेस की कहीं ज्यादा जरूरत है। मुलायम के खिलाफ सीबीआई में आय से अधिक संपत्ति का मामला अभी भी विचाराधीन है और इसमें मुलायम सिंह बहुत बुरी तरह फंसे हुए हैं। ऐसे में मुलायम नहीं चाहेंगे कि उनकी छीछालेदर हो। ये डर उन्हें काफी समय से बना हुआ है, यही वजह है कि यूपीए वन को भी उन्होंने समर्थन दिया था, ये समर्थन उस समय भी जारी था, जब केंद्र सरकार समाजवादी पार्टी की कोई भी मांग मानने को तैयार नहीं थी। अभी भी मुलायम सिंह सरकार को बिना शर्त समर्थन दे रहे हैं। पर ताजा हालात जो बन रहे हैं, उससे लगता है कि अब कांग्रेस ममता को किनारे लगाएगी और मुलायम को सरकार के अंदर लाने की पूरी कोशिश होगी। इतना नहीं मुलायम को कुछ अच्छे मंत्रालयों की भी पेशकश की जा सकती है। बहरहाल मामले चल रहे हैं, अभी कुछ भी अंतिम नहीं हो सकता है, पर ममता की मुश्किल जरूर बढने वाली है।   
   

Monday, January 16, 2012

बदबू आती है यूपी की राजनीति से ...

चुनाव जीतना है मकसद, तरीका कुछ भी और कैसा भी हो। सच कहूं तो इस समय नेताओं की बातों में इतनी गंदगी भरी हुई है कि इनका नाम भर सुनकर बदबू आने लगती है। अब देखिए अपने जन्मदिन पर भी मायावती शालीन नहीं रह पाईं। तर्क भी ऐसे बेपढों वाली देतीं हैं कि हैरानी होती है। सच कहूं तो चुनाव आयोग ने मायावती का बहुत पक्ष लिया, वरना उन्होंने जिस तरह से सरकारी पैसे का दुरुपयोग करके जगह जगह अपनी और पार्टी के चुनाव निशान हाथी की मूर्ति रखवा दी, उसकी सजा इन मूर्तियों को ढकना भर नहीं है। सजा तो ये होनी चाहिए कि मायावती को जीवन भर के लिए चुनाव लड़ने के अयोग्य कर दिया जाना चाहिए। इतना ही नहीं पार्टी का चुनाव निशान भी बदल देना चाहिए। ऐसा नहीं है कि ये बात मायावती नहीं जानती हैं कि उन्होंने कितना बड़ा अपराध किया है, लेकिन कुतर्क देखिए, कि अगर ऐसा है तो लोकदल का चुनाव निशान हैंडपंप भी सरकारी खजाने से लगा है, उसे भी ढक दिया जाए। मायावती ऐसी घटिया बातें जान बूझ कर करती हैं, क्योंकि जो उनके वोटर हैं, उन्हें ऐसी ही सतही बातें समझ में आती हैं।
एक ओर जब देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ इतना बड़ा आंदोलन छिड़ा हो और वो चुनाव का मुद्दा बन रहा हो, तब ऐसा काम बीजेपी ही कर सकती है कि एक बेईमान नेता बाबू सिंह कुशवाहा को अपनी पार्टी में शामिल करे। ऐसे में जब बीजेपी कहती है कि उसका चाल चरित्र और चेहरा दूसरी पार्टियों से अलग है, तो मुझे भी लगता है कि वाकई अलग है। ऐसा करने की हिम्मत और पार्टी तो बिल्कुल नहीं कर सकती। अच्छा भाजपाई अपने कुकृत्यों के बचाव में भी देवी देवाताओं को इस्तेमाल करने से नहीं चूकते। बाबू सिंह कुशवाह को लेने के बाद भाजपा से जब पूछा गया कि इससे पार्टी की छवि पर खराब असर नहीं पड़ा, तो पार्टी के एक नेता ने कहा कि गंगा मइया में हजारों गंदे नाले आकर मिलते हैं तो क्या गंगा मइया मैली हो गई, उसकी पवित्रता खत्म हो गई ? शाबाश.. भाजपाइयों आपका कोई जवाब नहीं। इसीलिए अभी तीसरे नंबर की पार्टी है, इस चुनाव में क्या होगा, भगवान मालिक है।
कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव राहुल गांधी बहुत मेहनत कर रहे हैं उत्तर प्रदेश में। उन्हें लग रहा है कि उनकी पार्टी बहुत बेहतर प्रदर्शन करेगी इस चुनाव में। पर राहुल को कौन समझाए कि वो बेचारे जितना मेहनत करते हैं उनकी पार्टी के नेता दिग्विजय सिंह उस पर पानी फेर देते हैं। राहुल अच्छा माहौल बना रहे थे कि श्री सिंह ने राहुल के किए कराए पर पानी फेर दिया। अरे क्या जरूरत थी इस समय बाटला हाउस मामले की चर्चा करने की। बाटला हाउस की चर्चा से श्री सिंह सुर्खियों में जरूर आ गए, लेकिन वोट में इजाफा बिल्कुल नहीं  हुआ है। वैसे दिग्विजय मुझे तो किसी गंभीर बीमारी के शिकार लगते हैं, उनसे जनता जितनी दूर रहे वही अच्छा है। उनके पास मीडिया वाले बस इसीलिए जाते हैं कि कुछ आंय बांय शांय बोल देगें तो पूरे दिन का काम हो जाएगा।
अब बची समाजवादी पार्टी। मुझे लगता है कि अमर सिंह से छुटकारा पाने के बाद पार्टी थोड़ा विवादों से दूर है। वैसे युवा नेता अखिलेश की मेहनत कितना रंग लाएगी, ये तो  चुनाव के नतीजों से पता चलेगा, पर डी पी यादव को पार्टी में लेने से इनकार कर अखिलेश ने ये तो साबित कर दिया है कि वो सही मायने में पार्टी के अध्यक्ष हैं और वो जो ठीक समझते हैं वहीं करेंगे। इन सबके बाद भी तमाम अपराधी छवि वाले लोग पार्टी का टिकट पाने में कामयाब हो गए हैं, इसलिए सपा को भी पाक साफ कहना गलत ही है।
बहरहाल यूपी के लोगों से एक सवाल पूछता हूं। यूपी के साथ चार और राज्यों में भी चुनाव हो रहे हैं , क्या आपको वहां की कोई खबर है ? मुझे लगता  है कि कोई खबर नहीं होगी, क्योंकि वहां ऐसा कुछ है ही नहीं जो खबर बने। लेकिन आपको पता है यूपी के चुनाव की खबरें देश भर के अखबारों की सुर्खियों में है। इसलिए सबको पता है कि यूपी में क्या हो रहा है। नेताओं का बायोडाटा, कितने अपराधिक मामले, सबसे पैसे वाली दलित मुख्यमंत्री, रोजाना यूपी में करोडों रुपयों का पकड़ा जाना, असलहों की बरामदगी, नेताओं की दंबंगई, गांव गांव शराब की बरामदगी सब कुछ तो है सुर्खियों में। सही बताऊं बदबू आ रही है यूपी के चुनाव से, लेकिन क्या करुं मुझे भी पूरे एक महीने इन्हीं बदबूदार नेताओं के साथ बिताना है। भगवान भला करें।