Thursday, June 14, 2012

खत्म होगा ममता का खेल ....

ममता बनर्जी का खेल खत्म होने वाला है। ममता की राजनीति को अगर आप थोडा भी समझते हैं तो आपको पता होना चाहिए कि ये अविश्वसनीय, अड़ियल और जिद्दी है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को इन्होंने खून के आंसू रोने पर मजबूर कर दिया था। ममता वही है, हां अटल जैसे स्वाभिमानी मनमोहन सिंह नहीं हैं, ये अपनी जब तक पूरी किरकिरी और थू थू नहीं करा लेंगे, कुर्सी छोड़ने वाले नहीं है। वरना तो जिस तरह से इनका नाम मुलायम और ममता ने राष्ट्रपति पद के लिए लिया है, उससे साफ हो गया है कि आप यूपीए गठबंधन के निर्विवाद नेता नहीं रहे। लिहाजा आपको सरकार और देशहित में तुरंत कुर्सी छोड़कर अपने स्वास्थ्य पर ध्यान देना चाहिए। खैर मनमोहन से ऐसे आदर्श की उम्मीद करना बैल से दुहना जैसा है।

खैर अब ममता की मुसीबत बढ़ने वाली है। वो कहने है ना ......... घर का ना घाट का। वैसी ही स्थिति बनने होने जा रही है ममता की। ममता की आज तक किसी से नहीं बनी है, तो भला मुलायम सिंह यादव से कितनी देर बनी रहेगी। ममता कभी भी सोच समझ कर ठंडे दिमाग से फैसला नहीं करती हैं। उनका  राजनीतिक मान मर्यादा से कोई सरोकार नहीं है। उनके लिए राष्ट्रपति का चुनाव और ग्राम प्रधान के चुनाव में कोई अंतर नहीं है। इस बार ममता मुलायम को समझने में धोखा खा रही है। उन्हें पता होना चाहिए कि मुलायम की आय से अधिक संपत्ति के मामले में बहुत फुरे फंसे हुए हैं, यही वजह है कि न्यूक्लीयर डील के दौरान जब यूपीए 1 से वामपंथियों ने सरकार से समर्थन वापस लिया था, तो मुलायम झट से 10 जनपथ पहुंच गए और सरकार को समर्थन का ऐलान कर दिया। जबकि सबको पता है कि वामपंथियों से समाजवादी पार्टी के बहुत अच्छे रिश्ते थे। ये बात जानते हुए भी ममता ने मुलायम पर भरोसा किया है, जल्दी उन्हें मुलायम की हकीकत की जानकारी हो जाएगी।

सच ये है कि कांग्रेस को मुलायम की जरूरत है, उतना ही सच ये भी है कि मुलायम को कांग्रेस की कहीं ज्यादा जरूरत है। मुलायम के खिलाफ सीबीआई में आय से अधिक संपत्ति का मामला अभी भी विचाराधीन है और इसमें मुलायम सिंह बहुत बुरी तरह फंसे हुए हैं। ऐसे में मुलायम नहीं चाहेंगे कि उनकी छीछालेदर हो। ये डर उन्हें काफी समय से बना हुआ है, यही वजह है कि यूपीए वन को भी उन्होंने समर्थन दिया था, ये समर्थन उस समय भी जारी था, जब केंद्र सरकार समाजवादी पार्टी की कोई भी मांग मानने को तैयार नहीं थी। अभी भी मुलायम सिंह सरकार को बिना शर्त समर्थन दे रहे हैं। पर ताजा हालात जो बन रहे हैं, उससे लगता है कि अब कांग्रेस ममता को किनारे लगाएगी और मुलायम को सरकार के अंदर लाने की पूरी कोशिश होगी। इतना नहीं मुलायम को कुछ अच्छे मंत्रालयों की भी पेशकश की जा सकती है। बहरहाल मामले चल रहे हैं, अभी कुछ भी अंतिम नहीं हो सकता है, पर ममता की मुश्किल जरूर बढने वाली है।   
   

Tuesday, June 12, 2012

प्रणव दा के राष्ट्रपति बनने की कीमत ....

रीब करीब अब तय हो गया है कि केंद्र सरकार में वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ही यूपीए की ओर से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार होंगे। छोटी मोटी बातों की अनदेखी कर दी जाए तो श्री मुखर्जी की छवि आमतौर पर साफ सुथरी ही है। अगर मुखर्जी उम्मीदवार होते हैं, तो मुझे लगता नहीं रायसीना हिल यानि राष्ट्रपति भवन पहुंचने में उन्हें किसी तरह की दिक्कत होगी। यूपीए के साथ ही मुझे नहीं लगता कि एनडीए को भी श्री मुखर्जी से कोई दिक्कत है। जानकार तो कह रहे हैं कि दादा के राष्ट्रपति बनाने की जो भी कीमत चुकानी होगी, वो चुकाने के लिए सरकार तैयार है, बस जनता में ऐसा मैसेज ना जाए, इसी पर बातचीत चल रही है। 
चुनाव की अधिसूचना भले ही आज जारी हुई हो पर इस चुनाव की बिसात कई दिन से बिछाई जा रही हैं। चुनाव की तारीखों का ऐलान होने के बाद अब राजनीतिक दलों ने अपने अपने रंग दिखाने शुरू कर दिए हैं। रंग क्या, चलिए साफ साफ बताते हैं चुनाव में यूपीए उम्मीदवार का समर्थन करने के लिए स्पेशल पैकेज के नाम पर पैसे की मांग हो रही है। जब राष्ट्रपति जैसे अहम चुनाव के लिए भी राजनीतिक दल सौदेबाजी कर रहे हैं तो दूसरे काम के लिए भला क्यों नहीं करते होंगे?
सच्चाई क्या है ये तो यूपीए चेयरमैन सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री जानें। पर जनता में जो संदेश जा रहा है उससे तो साफ है कि ममता और मुलायम ने सरकार को बंधक बना रखा है। वैसे तो बंगाल की मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही ममता लगातार स्पेशल पैकेज की मांग कर रही हैं। उनकी ये मांग इसलिए भी पूरी नहीं हो पा रही है कि उनसे काफी पहले से बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार स्पेशल पैकेज की मांग कर रहे हैं, पर ये पैकेज उन्हें नहीं दिया गया। ऐसे में अगर ममता की बात मानी जाती है तो देश में गलत संदेश जाता। फिर ममता ने नया राग अलापना शुरू कर दिया, वो कह रही हैं कि उन्हें स्पेशल पैकेज के साथ ही केंद्र से लिए कर्ज 20 हजार करोड रुपये की ब्याज वसूली तीन साल के लिए बंद कर दी जाए। चुनाव तक ममता कितनी चीजें मांग लेंगी, कुछ भी कहना मुश्किल है। अच्छा मुलायम भी ममता से पीछे नहीं, भारी भरकम पैकेज तो उन्हें भी चाहिए। अब वित्तमंत्री को देखना है कि वो रायसीना हिल पहुंचने के लिए सरकारी खजाने में सेंध लगाते हैं या नहीं।
खैर बड़ा सवाल ये है कि क्या मुखर्जी से जो उम्मीदें सोनिया गांधी को हैं, वो पूरी होंगी ? जबकि सबको पता है कि प्रणव दा कांग्रेस के सबसे वरिष्ठ नेता रहे हैं, सच कहूं तो मनमोहन सिंह के बजाए प्रवण दा को ही प्रधानमंत्री बनाया जाना चाहिए था। पर कहते हैं ना कि दूध का जला छाछ भी फूंक फूंक कर पीता है। पूर्व प्रधानमंत्री स्व नरसिम्हा राव ने जिस तरह गांधी परिवार को उन्हीं के घर में ही समेट कर रख दिया था, उसके बाद सोनिया कभी भी प्रणव को प्रधानमंत्री नहीं बना सकतीं थीं। उन्हें तलाश थी ऐसे आदमी की जिसके शरीर में शरीर की सबसे जरूरी हड्डी यानि रीढ़ की हड्डी ना हो। इसके लिए उन्होंने मनमोहन सिंह का चयन किया, और मैं दाद देता हूं सोनिया गांधी का कि उनका चयन बिल्कुल गलत नहीं था, मनमोहन से वफादार कोई और हो ही नहीं सकता था। बहरहाल कुछ भी हो, पर एक टीस दादा के मन में तो है ही, कि उन्हें प्रधानमंत्री बनने से एक साजिश के तहत रोका गया। इसीलिए शायद उन्होंने रायसीना हिल के लिए हामी भर दी होगी, क्योंकि 7 आरसीआर तो उन्हें कांग्रेस भेजने वाली नहीं। अब राहुल गांधी इसके लिए लगभग तैयार हैं, दादा ने सोचा कि कल के छोकरे के अधीन काम करने से तो अच्छा है कि राष्ट्रपति ही बन जाएं। 
            
चलते-चलते

राष्ट्रपति चुनाव को ममता और मुलायम ने जितना गंदा नहीं किया, उससे ज्यादा गंदा कर दिया पूर्व स्पीकर पीए संगमा ने। वैसे तो सब जानते हैं कि चुनाव कोई भी हो, वहां जाति पाति की बात होती ही है। ए पी जे अबुल कलाम भी राष्ट्रपति इसलिए नहीं बने थे कि वो बहुत ज्यादा काबिल थे, बल्कि वो मुसलमान थे, ये उनके पक्ष में गया था। लेकिन ये बात खुलकर किसी ने कही नहीं थी। लेकिन संगमा को क्या हो गया है, ये पढे लिखे हैं, काफी समय तक सक्रिय राजनीति में रहे हैं और यहां दिल्ली में खुलकर कह रहे हैं कि एक बार आदिवासी को भी राष्ट्रपति बनाया जाना चाहिए। चलो भाई आदिवासी को ही बनाते हैं, तो ऐसा नहीं है ना का आप ही 24 कैरेट के आदिवासी हैं। बहुत सारे आदिवासी नेता हैं, जो इस पद के काबिल है। लेकिन इन्होंने जिस तरह से छुटभैये नेता की तरह उम्मीदवार बनने के लिए नेताओं को चौखटें चाटी उसके बाद तो इन्हें राष्टपति तो दूर राष्टपति भवन में क्लर्क बनाना भी गलत होगा। इनके चक्कर में इनकी बेटी आगाथा जो एनसीपी के कोटे से केंद्र में राज्यमंत्री है, उसे भी पार्टी की खरी खोटी सुननी पड़ गई।  

Sunday, May 13, 2012

गांव गया था, गांव से भागा

गांव गया था गांव से भागा

गांव गया था
गांव से भागा
रामराज का हाल देखकर
पंचायत की चाल देखकर
आंगन में दीवाल देखकर
सिर पर आती डाल देखकर
नदी का पानी लाल देखकर
और आंख में बाल देखकर
गांव गया था
गांव से भागा।

गांव गया था
गांव से भागा
 सरकारी स्कीम देखकर
बालू में से क्रीम देखकर
देह बनाती टीम देखकर
हवा में उड़ता भीम देखकर
सौ-सौ नीम हकीम देखकर
गिरवी राम रहीम देखकर
गांव गया था
गांव से भागा।

गांव गया था
गांव से भागा
जला हुआ खलिहान देखकर
नेता का दालान देखकर
मुस्काता शैतान देखकर
घिघियाता इंसान देखकर
कहीं नहीं ईमान देखकर
बोझ हुआ मेहमान देखकर
गांव गया था
गांव से भागा।

गांव गया था
गांव से भागा
नये धनी का रंग देखकर
रंग हुआ बदरंग देखकर
बातचीत का ढंग देखकर
कुएं-कुएं में भंग देखकर
झूठी शान उमंग देखकर
पुलिस चोर के संग देखकर
गांव गया था
गांव से भागा।

गांव गया था
गांव से भागा।
बिना टिकट बारात देखकर
टाट देखकर भात देखकर
वही ढाक के पात देखकर
पोखर में नवजात देखकर
पड़ी पेट पर लात देखकर
मैं अपनी औकात देखकर
गांव गया था
गांव से भागा।

गांव गया था
गांव से भागा
नये नये हथियार देखकर
लहू-लहू त्यौहार देखकर
झूठ की जै-जैकार देखकर
सच पर पड ती मार देखकर
भगतिन का श्रृंगार देखकर
गिरी व्यास की लार देखकर
गांव गया था
गांव से भागा।

गांव गया था
गांव से भागा
मुठ्‌ठी में कानून देखकर
किचकिच दोनों जून देखकर
सिर पर चढ़ा जुनून देखकर
गंजे को नाखून देखकर
उजबक अफलातून देखकर
पंडित का सैलून देखकर
गांव गया था
गांव से भागा।

स्व. कैलाश गौतम

Tuesday, April 24, 2012

बहुत याद आएगी मारुति 800

हले एक नजर इस तस्वीर पर डालिए, क्या आपको कुछ याद आ रहा है। अगर नहीं तो हम बताते हैं कि ये तस्वीर लगभग 28 साल पुरानी है। पूर्व प्रधानमंत्री स्व. श्रीमति इंदिरा गांधी अपने दिवंगत पुत्र संजय गांधी के सपने को पूरा कर रही हैं। संजय ने सपना देखा था कि  देश के मध्यम श्रेणी के लोगों के लिए कार की सवारी का। यानि ऐसी सस्ती कार बनाने का जिसे लोग आसानी से खरीद सकें। चित्र में श्रीमति गांधी मारुति 800 पहली कार की चाभी लकी खरीददार दिल्ली के हरपाल सिंह को सौप रही हैं। लेकिन ये क्या खबर है, खबर ये है कि अब इस कार के  पहिए थम जाएंगे, क्योकि  मारुति ने 25 अप्रैल से इस कार के उत्पादन को पूरी तरह से बंद करने का निर्णय लिया है। 
मारुति 800 कार का सफर लगभग 28 साल का रहा और इस दौरान कंपनी ने 28 लाख  से ज्यादा कारें लोगों तक पहुंचाई। सच कहूं तो जिन लोगों की हैसियत एक सामान्य स्कूटर की रही, उनके हाथ में मारुति ने अपनी कार की चाभी थमाई। मारुति देश मे पहली कार निर्माता कंपनी है,  जिसकी सबसे ज्यादा कारें सड़कों पर फर्राटा भर रही हैं। इसमें मारुति 800 कार सड़कों पर दौड़ लगाने वाली चौपहिया वाहनों में पहले नंबर पर है। कंपनी का कहना है कि वह अब इसकी जगह एक नई कार को बाजार में उतारेगी। हालांकि अभी इसके नाम का खुलासा नहीं किया गया है लेकिन माना जा रहा है कि मारुति की सर्वो को मारुति 800 का स्थान दिया जा सकता है। वैसे सच ये है कि अब कोई कार मारुति 800 की जगह ले पाएगी, ये कहना काफी मुश्किल है। इसकी वजह है कि अब भारत में कई कंपनियों की छोटी कारें मौजूद हैं जो मारुति की नई कार को कड़ी चुनौती दे सकती है। 
मारुति सुजूकी इंडिया के चेयरमैन आर. सी. भार्गव का  कहना है कि 'मारुति 800 के साथ कंपनी भावनात्मक रूप से जुड़ी हुई है। लेकिन कारोबार पर भावना को हावी नहीं होने दिया जा सकता। कंपनी ने इसे बीएस-4 उत्सर्जन मानकों के अनुरूप नहीं ढाला है।' अब एनसीआर, मुंबई, कोलकाता, चेन्नै, बेंगलुरु, हैदराबाद और अहमदाबाद सहित 13 शहरों में बीएस-4 उत्सर्जन मानक लागू हो गए हैं, जबकि देश के अन्य शहर अक्टूबर में बीएस-3 उत्सर्जन मानकों को अपनाएंगे। ऐसे में इस कार के उत्पादन को बंद करने के अलावा  कोई रास्ता  नहीं बचा था।
आपको याद होगा कि 1983 में जब इस कार की शुरुआत हुई थी उस समय लोगों के घरों  में एंबेसडर कार या फिर फिएट हुआ करती थी। लेकिन मारुति ने अपने आकर्षक लुक और बेहतर एवरेज के चक्कर में इन दोनों कारो की छुट्टी कर दी। मुझे याद है कि उस दौरान मैं इंटर में पढ़ रहा था, हमारे यहां एक सफेद रंग की फिएट कार हुआ करती थी, हमारे पडो़स में रहने वाले गुप्ता जी ने मारुति 800 कार खरीदी, तो उनके घर में पूरा मुहल्ला जमा हो गया इस कार को देखने के लिए। गुप्ता जी जब ये कार लेकर निकलते थे तो हम सब इस कार की ओर ललचाई आंखों से देखा करते थे। मुझे याद है गुप्ता जी का पूरा परिवार सुबह सुबह इस कार को पोछने में जुटा रहता था।
बहरहाल बाजार में प्रतिस्पर्धा है और जब भी प्रतिस्पर्धा होती है, तो इसका फायदा उपभोक्ताओं को ही मिलता है। मारुति 800 और आल्टो को बंद कर कंपनी इससे  भी कुछ कम कीमत में दूसरी कार बाजार में उतारने जा रही है। आपको पता है इस समय टाटा की नैनो सबसे सस्ती कारों में शुमार है और एक सर्वे से पता चला है कि ये युवाओं और महिलाओं की खास पसंद है। कंपनी इसी वर्ग को ध्यान में रखकर नई कार का प्लान कर रही है। उसे पता है कि बाजार पर कब्जा बनाने के लिए नैनो से बेहतर और उसके आप पास की कीमत में ही कार को मार्केट में लाना होगा। तो क्या करना है कुछ दिन इंतजार कर ही लेते हैं। वैसे सच बताऊं मारुति 800 बहुत याद आएगी। 



Tuesday, March 20, 2012

शर्मनाक : यात्री के ऊपर किया पेशाब ...

क हैरान करने वाली घटना की जानकारी आपको देता हूं। इसकी जानकारी तो मुझे   कल ही यानि सोमवार को शाम मिल गई थी, पर यकीन नहीं हो रहा था कि राजधानी जैसी ट्रेन के एसी 2 कोच में ऐसी घटना भी हो सकती है। पर जब पूरे मामले की जानकारी हुई तो तृणमूल कांग्रेस और  उसके नेताओं से नफरत सी हो गई है।

ममता बनर्जी फायर ब्रांड नेता हैं, ये सभी जानते हैं। सबको पता है कि रेलमंत्री कोई भी हो राज ममता का ही चलेगा। इसलिए पूरी पार्टी इस समय बेलगाम हो गई है। जब नेताओं का ये हाल है तो नेताओं के कारिंदे तो दो कदम आगे चलेंगे ही। हुआ क्या, पूरा वाकया बताता हूं। हावड़ा दिल्ली राजधानी पर टीएमसी के एक सांसद सफर कर रहे थे, वो एसी 1 में थे, जबकि उनका गनर एसी 2 में था। रात में उसने ट्रेन में ही शराब पी और हंगामा करता रहा। कुछ लोगों ने शोर मचाने से रोका तो वह नाराज हो गया। 

बात यहीं तक होती तो गनीमत थी, देर रात गनर को टायलेट जाना था, बेलगाम गनर ने उस आदमी के ऊपर पेशाब करने लगा, जिसने उसे शोर  मचाने से रोका था। जब उसने शोर मचाया तो गनर ने अपनी सर्विस रिवाल्वर उसके ऊपर तान दी, और कहा कि शोर मचाया तो यहीं ढेर कर दूंगा। बहरहाल इस शोर शराबे में और यात्री भी उठ गए और सभी ने टीटीई को बुलाकर कम्पलेंट दर्ज कराई। लेकिन ये गनर टीएमसी सांसद का था, तो रेल कर्मचारी कोई भी कार्रवाई करने से पीछे हट गए।

बाद में भुक्तभोगी पैंसेजर ने इलाहाबाद रेलवे स्टेशन पर पूरे मामले की जानकारी दी और गनर के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी। चलिए बात यहीं खत्म होती तो समझ लिया जाता कि शराब के नशे में गनर ने कुछ कर दिया होगा, पर इससे भी शर्मनाक बात तो ये है कि जब टीएमसी सांसद जो महिला हैं, उन्हें ये जानकारी दी गई कि आपके गनर ने ऐसा किया तो उनका कहना था, ये छोटी मोटी बातें होती रहती हैं। 

मै जानता हूं कि इस मामले की शिकायत अगर ममता बनर्जी से भी होगी तो वो कोई खास तवज्जो नहीं देंगी, क्योंकि अपर क्लास का आदमी उनकी प्राथमिकता में ही नहीं है। उनसे किराया भी  ज्यादा वसूला जाएगा, इन्हें सर्विस टैक्स भी देना होगा, बदले में अपर क्लास यात्रियों को सोते समय पेशाब से नहाना होगा। अब इससे ज्यादा क्या कह सकता हूं.. आक्क थू, ऐसी राजनीति की। 

Saturday, March 10, 2012

टीपू बन गया सुल्तान ...

बराइये नहीं यहां बात टीपू सुल्तान की नहीं हो रही है। दरअसल मुलायम सिह यादव के बेटे अखिलेश यादव को लोग घर में प्यार से टीपू बुलाते हैं। यही टीपू अब उत्तर प्रदेश का सुल्तान बन रहा है, क्योंकि पार्टी विधायक दल की बैठक में उसे नेता चुन लिया गया है। 15 मार्च को शपथ ग्रहण के बाद टीपू यूपी का सबसे कम उम्र का मुख्यमंत्री बन जाएगा।

मुख्यमंत्री भले ही टीपू बन रहा हो, लेकिन ना जाने क्यों यूपी के युवाओं की उम्मींदे काफी बढ़ गई हैं, उन्हें लग रहा है कि पहली बार ऐसा होगा जब यूपी की गद्दी को कोई ऐसा युवा संभालने जा रहा है, जिसे युवाओं की जरूरतों की जानकारी है। युवाओं की तकलीफों का उसे अहसास है। युवाओं की उम्मीदों पर अखिलेश कितने खरे उतरेंगे, ये बाद की बात है, पर आज युवाओं को लग रहा है कि यही मायने में अब सरकार में उनका प्रतिनिधित्व हो रहा है।

मुलायम सिंह यादव की पहले भी यूपी में सरकार रही है। लेकिन मैं उसे समाजवादी पार्टी की सरकार नहीं मानता। वो नचनियों और गवइयों की बुनियाद पर बनने वाली सरकार रही है। होता क्या था कि अमर सिंह कुछ फिल्मी कलाकारों को मैनेज कर लेते थे, और समाजवादी पार्टी के बैनर तले होने वाली सभाओं में अमिताभ बच्चन, जया बच्चन, जया प्रदा, संजय दत्त, मनोज तिवारी टाइप लोग भाषण देते थे। इन्हीं फिल्मी कलाकारों के दम पर अमर सिंह भी नेता बने घूम रहे थे। 

जिस तरह से मुर्गे को लगता है कि अगर वो सुबह सबको ना जगाए और तो दिन ही नहीं निकलेगा, उसी तरह अमर सिंह को भी लगने लगा था कि समाजवादी पार्टी उनके बगैर शून्य है। बहरहाल जिस अमिताभ बच्चन को वो बड़ा भैया कहते थे, आजकल बड़ा भैया से नाराज चल रहे हैं तो मुलायम सिंह यादव को तो वो नेता जी कहते थे, तो नेता से कितने दिनों तक बन सकती थी। खैर बात कुछ और हो रही थी, मैं कहीं और चला गया, लेकिन मेरा अभी भी पक्का मानना है कि समाजवादी पार्टी से अमर सिंह का अलग होना भी पार्टी की ऐतिहासिक जीत की एक वजह है। 
इसके अलावा मुलायम सिंह यादव के भाई शिवपाल यादव से भी यूपी को भगवान बचाए रखे। सच तो ये है कि शिवपाल में राजनीति की ना समझ है, ना राजनीतिक चरित्र है, ना ईमानदारी है और ना ही जनता और पार्टी में उनकी छवि ठीक है। समाजवादी पार्टी में जितने में गंदे किस्म के लोग है, उन्हें शिवपाल यादव का ही संरक्षण प्राप्त है। मुझे लगता है कि अब अखिलेश की अगुवाई में समाजवादी पार्टी मे कम से कम महिलाओं को शोषण बंद हो जाएगा। कुछ गुंडे छवि के लोगों को पार्टी में शामिल करने से साफ मना कर दिए जाने से अखिलेश का ग्राफ बहुत ऊंचा हो गया है। यही वजह  है कि लोगों की उम्मीद जगी है कि अब इस पार्टी में भी साफ सुथरे लोगों के लिए गुंजाइस बनी रहेगी।

भाई आजम खां वाकई वरिष्ठ नेता हैं। लेकिन उन्हें भी जिस तरह से इस बार चुनाव के दौरान रामपुर में ही रखा गया, उससे भी सपा को फायदा हुआ है। अब जनता गाली गलौज और गंदी सियासत को समझने लगी है। रामपुर में एक  खास परिवार को जिस तरह तल्ख भाषा में आजम खां कोसते रहते हैं, ये बात भी लोगों के गले नहीं उतरती। इसलिए जरूरी था कि आजम भाई पर नकेल कसा जाए। चुनाव प्रयार का कमान मुलायम और अखिलेश के हाथ में होने से लगा कि सच में अब समाजवादी पार्टी की सभा हो रही है, लोहियावादी नेताओं की सभा हो रही है, जनेश्वर जी जैसा सोचते थे, उन विचारों की सभा हो रही है। 

बहरहाल अब भाई अखिलेश जी आपकी ताजपोशी हो जाएगी, लेकिन आगे का काम जरा मुश्किल है। यूपी कि अफसरशाही से भी बदबू आती है। मैने देखा बीएसपी की सरकार में जिलाधिकारी.... जिलाधिकारी बन कर काम नहीं कर रहे थे, बल्कि वो बीएसपी के जिलाध्यक्ष के तौर पर काम कर रहे थे। अब यूपी में मान सम्मान वाले अफसर नहीं रह गए, आपको देखना होगा कि जिस अफसर में अभी रीढ की हड्डी बची हो, उसे जिम्मेदारी का काम सौंपे, वरना जूता उठाने और उसे साफ करने वाले तो बहुत मिल जाएंगे।      

Friday, March 9, 2012

द्रविण के सन्यास से सचिन पर बढ़ा दबाव...

भारतीय क्रिकेट टीम के अहम सदस्य राहुल द्रविण ने आज टेस्ट क्रिकेट से भी सन्यास का ऐलान कर दिया। द्रविण टी 20 और एक दिवसीय मैच से पहले ही सन्यास ले चुके हैं। द्रविण ने सन्यास की घोषणा करते हुए कहा कि मैने युवाओं को मौका देने के लिए सन्यास का फैसला किया है और अब युवा खिलाड़ी इतिहास बनाएं। हालाकि मीडिया में द्रविण के सन्यास को लेकर ऐसा माहौल बनाया जा रहा है, जैसे उन्होंने बहुत महान काम कर दिया हो, दरअसल सच ये है कि आस्ट्रेलिया में जिस तरह से टीम पिटी है उसके बाद द्रविण का आगे के मैचों में चुना जाना भी तय नहीं था।
द्रविण टीम में इसलिए थे कि उन्हें टीम की दीवार कहा जाता था, उन्हें भरोसेमंद कहा जाता था, मिस्टर डिपेंडेबिल के साथ ही ना जाने क्या क्या कहा जाता था। लेकिन आस्ट्रेलिया के दौरे से साफ हो गया था कि अब ना वो टीम की दीवार रहे, ना ही भरोसेमंद और डिपेंडेबिल रहे। ये बात खुद द्रविण भी जानते हैं। लिहाजा उन्होंने अगर सन्यास लेने का ऐलान किया तो इसमें कुछ भी खास नहीं है। मैं तो कहूंगा कि देर से उठाया गया सही कदम है। हालाकि द्रविण की प्रेस कान्फ्रेंस से ये बात भी साफ हो गई है कि टीम में भारी मतभेद है। पिछले दिनों टीम के कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी इशारों इशोरों में साफ कर दिया था कि सभी सीनियर खिलाडियों को एक साथ टीम में नहीं रखा जा सकता। मतलब सचिन, सहवाग और द्वविण को एक साथ टीम में रखने से क्षेत्ररक्षण पर असर पड़ता है, मैं व्यक्तिगत रूप से और धोनी की बात से सहमत हूं, लेकिन द्रविण ने जाते जाते जो किया, उससे सवाल खड़ा होना तय है।
द्रविण ने पत्रकारों से बातचीत के दौरान उन खिलाड़ियों का नाम लिया, जिन्हें वे बहुत मानते हैं और इन खिलाड़ियों को मिस भी करेंगे। इसमें उन्होंने सौरभ गांगुली, सचिन तेंदुलकर, अनिल कुंबले, वीरेन्द्र सहवाग, हरभजन सिंह समेत तमाम खिलाड़ियों के नाम लिए, लेकिन मौजूदा टीम के कप्तान धोनी का उन्होंने कहीं जिक्र तक नहीं किया। इससे साफ है कि सीनियर खिलाड़ी धोनी को पसंद नहीं करते हैं, या फिर टीम में सबकुछ ठीक नहीं है। बहरहाल द्रविण के उज्जवल भविष्य और सुखद पारिवारिक जीवन की मैं भी कामना करता हूं, लेकिन मुझे लगता है कि अगर द्रविण ये मानते है कि युवा खिलाड़ियों को मौका मिलना चाहिए, तो ये बात सचिन की समझ में क्यों नहीं आ रही है।
सचिन अपने शतकों के शतक से महज एक कदम दूर हैं। मुझे भी लगता है कि उनका शतकों का शतक बनना ही चाहिए। लेकिन सवाल ये उठता है कि कि आखिर इस एक शतक के लिए देश को कितना इंतजार करना होगा। अभी तक इस शतक के लिए देश साल भर इंतजार कर चुका है और इस दौरान सचिन टेस्ट मैच और एकदिवसीय मिलाकर कुछ 45 से भी ज्यादा पारी खेल चुके हैं और नाकाम रहे हैं। सच तो ये है कि अब सचिन के शतकों के शतक का ना किसी को इंतजार है और ना ही इसमें अब किसी की रुचि रह गई है।
साल भर पहले की बात है कि न्यूज चैनल अभियान चलाए हुए थे कि सचिन को भारत रत्न मिलना चाहिए। सरकार पर भी इतना दबाव बढा कि भारत रत्न दिए जाने के प्रावधान में फेरबदल कर साफ कर दिया गया कि अब किसी भी क्षेत्र में उल्लेखनीय काम करने पर भारत रत्न दिया जा सकता है। सचिन की लगातार नाकाम से हालत ये हो गई है कि अब कोई भारत रत्न दिए जाने की बात नहीं कर रहा, उल्टे ये पूछ रहा है कि आखिर टीम से सचिन कब बाहर होगे। द्रविण के सन्यास के बाद तो सचिन पर नैतिक दवाब और भी बढ गया है।