Thursday, November 28, 2013

180 करोड़ दान कर आ गए वृद्धाश्रम !

पहले गुजरात का एक किस्सा सुना दूं, फिर पूरी कहानी बताता हूं। बात करीब सात आठ साल पुरानी है, मुझे शिलांग से दिल्ली आना था, मैं शिलांग एयरपोर्ट पर सिक्योरिटी चेक के बाद लांज में मैं बैठा हुआ था। इसी बीच एक साहब मेरे पास आए और पूछा कि क्या आप "गुजराती" हैं । मैंने कहा.. नहीं मैं गुजराती नहीं हूं, यूपी का रहने वाला हूं। वो थोड़ा गंदा सा मुंह बनाया और चला गया। खैर थोड़ी देर में ही वहां बैठे दूसरे लोगों में से एक गुजराती को उसने तलाश लिया और उसके पास अपना ब्रीफकेश रख कर टाँयलेट चला गया। मुझे रहा नहीं गया, उसके वापस आने पर मैने पूछा कि क्या आप गुजराती की तलाश इसलिए कर रहे थे कि आपको  टाँयलेट जाना था और आप अपना ब्रीफकेश किसी गुजराती के पास रखना चाहते थे ? उसे मेरी बात पर कोई संकोच नहीं और कहां हां सही बात है। मैं गुजराती के अलावा किसी के पास ब्रीफकेश नहीं छोड़ सकता हूं। 

आप सोच रहे होंगे की आठ साल पुरानी बात आखिर आज मुझे याद क्यों आई ? दरअसल अखबार की एक खबर पढ़कर मैं हैरान हूं। हालाकि अखबार में पूरी खबर नहीं है, लेकिन जितनी बातें है, वो कम से कम मुझे चौंकाने के लिए काफी है। खबर ये कि गुजरात के एक दालिया दंपत्ति ने अपनी 180 करोड़ की प्रापर्टी स्कूल, कालेज और धार्मिक संस्थानों को दान कर खुद पत्नी के साथ सूरत के वृद्धाश्रम में आ गए। अखबार में इस बात का जिक्र नहीं है कि उनके बेटा - बेटी हैं या नहीं ! लेकिन उन्होंने शमशान घाट पर भी 50 हजार रुपये जमा करा दिए हैं, जिससे उनकी मौत के बाद उनका अंतिम संस्कार आसानी से हो सके। नरोत्तम भाई ( 97 ) और उनकी पत्नी लक्ष्मी बहन ( 84 )  सूरत के पास इलाके अडाजड़ से अब इस आश्रम में ही रह रहे हैं। वो मीडिया से भी दूरी बनाए हुए हैं। 



Wednesday, October 9, 2013

राजेन्द्र यादव बोले तो साहित्य का आसाराम !

जाने माने साहित्यकार राजेन्द्र यादव के बारे में जो खबरें आ रही हैं, वो बहुत घिनौनी है। मैं ज्योति को नही जानता, लेकिन कहा जा रहा है कि ज्योति राजेन्द्र जी की सहयोगी थी, जिसे राजेन्द्र यादव बेटी की तरह स्नेह करते थे, फिर भी ज्योति का एक वीडियो बन गया, इस वीडियो को लेकर राजेन्द्र का एक अन्य सहयोगी ज्योति को ब्लैकमेल करने की कोशिश कर  रहा था। वैसे ये वीडियो कहां बना, किसने बनाया, वीडियो में क्या है, वीडियो में ज्योति भर है या राजेन्द्र यादव भी हैं, किसी को कुछ नहीं पता। 

मैं हैरान इस बात पर हूं कि राजेन्द्र यादव के घर पर उनकी मौजूदगी में वीडियो की बात हो रही थी, झगड़ा झंझट सब उनकी आंखो के सामने होता रहा, ज्योति के साथ गाली गलौज हो रही थी, लेकिन साहित्यकार राजेन्द्र जी शराब पीते रहे। राजेन्द्र जी जिसे अपनी बेटी कहते हैं, उसे बचाने के लिए एक शब्द नहीं बोले। बहरहाल इसके बाद जो हुआ वो तो शर्म से डूब मरने की बात थी। ज्योति ने 100 नंबर डायल कर पुलिस को बुला लिया, पुलिस राजेन्द्र जी के घर से उनके दूसरे सहयोगी को साथ ले गई। अब मामला न्यायालय में है, वहां सभी  के अभियोग तय होंगे। सच क्या है और गलत क्या है, ये तो जब तय होगा तब देखा जाएगा, लेकिन राजेन्द्र यादव मेरी नजरों में बहुत नीचे गिर गए। जरूरत इस बात की है कि  साहित्य का ये आसाराम आत्मचिंतन करे और पूरे मामले में खुद ही अपनी सफाई दें। 

ऐसा नहीं है कि राजेन्द्र यादव के घर हुई इस घटना की जानकारी अखबारों और चैनलों को नहीं है। सब को हर बात पता है। वैसे भी अब इस मामले में बकायदा पुलिस में रिपोर्ट दर्ज हो चुकी है। इसके बाद भी साहित्य के आसाराम पर किसी चैनल ने चर्चा नहीं की। मुझे लगता है कि इस मुद्दे पर भी चर्चा होनी चाहिए। युवा लेखक और लेखिकाएं राजेन्द्र जी की प्रशंसक है, महिलाएं एक भरोसे से राजेन्द्र जी के पास आती हैं, अगर साहित्य की आड़ में कुछ ऐसा वैसा हो रहा है, तो ये गंभीर मामला है और इस पर भी बहस होनी चाहिए। 



ज्यादा जानकारी के लिए देखें ये लिंक...




Tuesday, August 20, 2013

रिटायर होकर आराम करने आया है टुंडा !

मुझे देश में बढ़ रहे आतंकवाद के बारे में तो अच्छी जानकारी है, लेकिन आतंकवादियों इनके ठिकाने, इनके संगठन के बारे में बस सुनी सुनाई बातें ही पता हैं। देख रहा हूं तीन चार दिन से एक सेवानिवृत्त आतंकवादी अब्दुल करीम टुंडा को लेकर दिल्ली पुलिस इधर उधर घूम रही है। हालाकि इसने अकेले ही पुलिस के पसीने छुड़ा दिए हैं। पुलिस उसे आतंकवाद की पांच घटनाओं में शामिल होने की बात करती है, टुंडा पुलिस की जानकारी में इजाफा करते हुए दावा करता है कि वो पांच और यानि आतंकवाद की 10 घटनाओं में शामिल रहा है। खुद को अंडरवर्ल्ड डाँन दाउद इब्राहिम का सबसे करीबी भी बता रहा है। इतना ही नहीं खुद ही कह रहा है कि वो लश्कर-ए-तैयबा (एलईटी) का बड़ा आतंकवादी है। पुलिस बहुत मेहनत से सवाल तैयार करती है, उसे लगता है कि टुंडा सही जवाब देने से हिचकेगा, लेकिन वो पुलिस को बिल्कुल निराश नहीं कर रहा है, आगे बढ़कर अपने अपराध कुबूलता जा रहा है। जानते हैं टुंडा खाने पीने का भी काफी शौकीन है, वो खाने में सिर्फ ये नहीं कहता है कि उसे बिरयानी चाहिए, बल्कि ये भी बताता है कि जामा मस्जिद की किस दुकान से बिरयानी मंगाई जाए। टुंडा के हाव भाव से साफ है कि वो यहां पुलिस से टांग तुडवाने नहीं बल्कि जेल में रहकर मुर्गे की टांग तोड़ने आया है।

सुना है कि भारत - नेपाल सीमा यानि उत्तराखंड के बनबसा से दिल्ली पुलिस ने इसे गिरफ्तार किया है। देखिये ये तो पुलिस का दावा है। लेकिन मुझे नहीं लगता है कि टुंडा पुलिस के बिछाए जाल में फंसा है, मेरा तो मानना है कि पुलिस इसके जाल में फंसी है। अंदर की बात बताऊं ? टुंडा की जो तस्वीर पुलिस के रिकार्ड में है, उस तस्वीर से तो पुलिस सात जन्म में भी टुंडा को तलाश नहीं सकती थी। हो सकता है कि ये बात गलत हो, पर मेरा तो यही मानना है कि टुंडा ने खुद ही पुलिस को अपनी पहचान बताई है। आप सोच रहे होंगे कि आखिर मैं क्या कहता जा रहा हूं। भला टुंडा क्यों पुलिस के हत्थे चढ़ेगा ? उसे मरना है क्या कि वो दिल्ली पुलिस के पास आएगा ? हां मुझे तो यही लगता है कि वो बिल्कुल आएगा, क्योंकि इसकी ठोस वजह भी है। दरअसल टुंडा अब बूढा हो गया है और इस उम्र में वो पुलिस के साथ आंखमिचौनी नहीं खेल सकता। ऐसे मे हो सकता है कि आतंकवादी गैंग से ये रिटायर हो गया हो। साथियों ने उसे सलाह दी हो कि अब तुम्हे आराम की जरूरत है।

किसी आतंकवादी को आराम की जरूरत हो तो उसके लिए भारत की जेल से बढिया जगह भला कहां मिल सकती है। मुझे तो लगता है कि वो यहां पूरी तरह आराम करने के मूड में ही आया है। यही वजह है कि वो किसी भी मामले में अपना बचाव नहीं कर रहा है। आतंकवाद से जुड़ी जिस घटना के बारे में भी पुलिस उससे पूछताछ करती है, वो सभी अपने को शामिल बताता है। इतना ही देश के दूसरे राज्यों में भी हुई आतंकी घटनाओं में भी वो अपने को शामिल बताने से पीछे नहीं हटता। हालत ये है कि दिल्ली पुलिस से उसकी पूछताछ पूरी होगी, फिर उसे एक एक कर दूसरे राज्य की पुलिस रिमांड पर लेकर अपने यहां ले जाएगी। ऐसे में टुंडे का पर्यटन भी होता रहेगा। घूमने फिरने का टुंडा वैसे भी शौकीन है, अब सरकारी खर्चे पर उसे ये सुविधा मिलेगी, तो भला उसे क्या दिक्कत है। 

और हां, देश की पुलिस की कमजोरी ये टुंडा जानता है। यहां पुलिस प्रमोशन और पदक के लिए पागल रहती है। जाहिर है इतने बड़े आतंकी को पकडने वाली पुलिस टीम को प्रमोशन भी मिलेगा और पदक भी। इसलिए टुंडा पुलिस की हर बात बिना दबाव के खुद ही मान ले रहा है। उसे ये भी पता है कि  कोर्ट में उसका जितने साल मुकदमा चलेगा, उतनी तो उसकी उम्र भी नहीं बची है। अब टुंडा इतना बड़ा आतंकी है तो उसे कड़ी सुरक्षा में रखा भी जाएगा। टुंडा सुन चुका है कि यहां कसाब के रखरखाव पर मुंबई सरकार ने कई सौ करोड रुपये खर्च किए हैं। यहां तक की उसकी मौत के बाद उसके शव को कई महीने तक सुरक्षित रखा गया था। कसाब को उसकी मन पसंद का खाना मिलता था, अब इस उम्र में टुंडा और क्या चाहिए ? लेकिन टुंडा ने कुछ जल्दबाजी कर दी, अभी पुलिस की पूछताछ चल ही रही है कि उसने पुलिस से लजीज खाने की मांग रखनी शुरू कर दी। एक सलाह दे रहा हूं टुंडा, थोड़ा तसल्ली रखो, जेल में अच्छी सुविधा मिलेगी। अभी अगर बिरयानी वगैरह मांगने लगे तो आगे मुश्किल हो जाएगी।


Saturday, August 10, 2013

हार गया INCOME TAX विभाग से !



मुझे लगता है कि कई मेरी तरह आप भी अपने चार्टर्ड एकाउंटेंट, बीमा एजेंट पर भरोसा कर लेते होंगे और सादे फार्म पर हस्ताक्षर करके उसे थमा देते होंगे। लेकिन इससे कैसी मुश्किल आती है, ये मुझसे बेहतर कोई नहीं जानता होगा। मतलब एक छोटी सी गलती को दुरुस्त कराना इस सरकारी सिस्टम में कितना मुश्किल है, ये सुनकर आपके भी कान खड़े हो जाएंगे। गलती ये कि आयकर के PAN कार्ड के लिए मैने सात साल पहले जब आवेदन किया तो फार्म पर हमने हस्ताक्षर पहले कर दिया और मेरे आफिस के ही एकाउंट्स से जुड़े सहकर्मी ने मेरा फार्म भरा। उस बंदे ने पहले तो मेरा mail ID बिना मुझसे पूछे गलत भर दिया, जो अब ठीक हो चुका है। इसके अलावा मेरे नाम Mahendra Kumar Srivastava की स्पेलिंग गलत कर दी। मतलब मैं श्रीवास्तव की स्पेलिंग SRIVASTAVA लिखता हूं, उसने फार्म में SHRIVASTAVA लिख दिया। अंतर ये कि उसने बेवजह " H " शामिल  कर दिया, जो मैं नहीं लिखता हूं। 

अब इस गलत नाम से PAN कार्ड बनकर मेरे पास आ गया। इस एक H ने मेरा बाजा बजा दिया है। मैं किसी लोन के लिए अप्लाई करता हूं तो रिजेक्ट हो जाता है। आँनलाइन रिटर्न दाखिल करने में असुविधा होती है। बैंक में मेरे नाम और आयकर के PAN में नाम अलग अलग होने से तमाम Financial Process में मुश्किल हो रही है। आपको लग रहा होगा कि ये कौन सा मुश्किल काम है, इसे ठीक कराया जा सकता है। बिल्कुल सही कहा आपने, ये ठीक हो सकता है, लेकिन इसके लिए मैं हर संभव कोशिश कर चुका हूं, और कई बार इसकी फीस दे चुका हूं, पर मामला ज्यों का त्यों है। मेरे चार्टर्ड एकाउंटेंट ने मुझसे कहाकि आप अपने बैंक के डाक्यूमेंट्स दे दीजिए, नाम ठीक हो जाएगा। मैने दे दिए, आयकर अधिकारी इसे नहीं माना। कहा कि बैंक के कागजात  मान्य नहीं हैं।

मुझसे हाईस्कूल का प्रमाण पत्र मांगा गया। मैने हाईस्कूल का प्रमाण पत्र दिया, लेकिन 1980 में मैने हाईस्कूल यूपी बोर्ड से किया है, उस वक्त प्रमाण पत्र पर नाम हिंदी में लिखे होते थे। इसलिए आयकर विभाग ने इस प्रमाण पत्र को खारिज कर दिया। मैने इंटर मीडिएट का सर्टिफिकेट दिया तो कहाकि इंटरमीडिएट का सर्टिफिकेट मान्य नहीं है। कहा गया कि आप आप चुनाव आयोग के पहचान पत्र की फोटो कापी दीजिए। बिल्कुल सही, मैने अगले ही दिन चुनाव आयोग की कार्ड की फोटो कापी दे दी, लेकिन इसमें आप जानते ही हैं कि मतदाता सूची और इस निर्वाचन आयोग के पहचान पत्र में पूरा नाम लिखने की जैसे परंपरा ही नहीं है। इसलिए इस पहचान पत्र में सिर्फ महेन्द्र कुमार ही लिखा है। यहां भी श्रीवास्तव नहीं है। बात ड्राईविंग लाइसेंस की हुई, मेरे पास ड्राईविंग लाइसेंस भी है। लेकिन ये लाइसेंस मिर्जापुर (उत्तर प्रदेश) का बना हुआ है, इसमें भी नाम हिंदी में है।

केंद्र सरकार की सबसे महत्वाकांक्षी योजना है आधार कार्ड। इस आधार कार्ड मे मेरा नाम हिंदी और अंग्रेजी में बिल्कुल स्पष्ट है। लेकिन आपको पता है, ये आधार कार्ड को आयकर विभाग की मान्यता ही नहीं है। सच बताऊं मैं अपने चार्टर्ड एकाउंटेंट की कार्यप्रणाली और आयकर विभाग की इतनी जटिल प्रकिया से हार गया हूं। अब मुझे एक  नया रास्ता बताया गया है। कहा जा रहा है कोई राजपत्रित अधिकारी आयकर विभाग के एक निर्धारित प्रपत्र पर ये लिखकर दे कि हां मैं Mahendra Kumar Srivastava को जानता हूं। इनके नाम के आगे Srivastava ही होना चाहिए। इस पर वो अधिकारी हस्ताक्षर करने के साथ ही अपने आई कार्ड का फोटो स्टेट भी देगा। बताइये मित्रों ! अब भला कोई अधिकारी मेरे लिए ऐसा क्यों करेगा ? लेकिन आप इसमें मेरी मदद करें तो मैं कृतज्ञ रहूंगा। अगर हमारे बीच कोई आयकर अधिकारी है तो प्लीज वो मेरी दिक्कत पर गौर फरमाएं।


 


Tuesday, July 23, 2013

बुरे फस गए बेचारे राहुल !

सच कहूं, जब आपके दिन बुरे चल रहे हों, तो भले ही आप हाथी पर क्यों ना बैठे हों, कुत्ता काट ही लेगा। राजनीति में भी हमेशा एक सा नहीं रहता, कुछ ऐसा वैसा चलता ही रहता है। दो दिन पहले कुछ बुद्धिजीवियों के साथ बैठा था। यहां सभी राजनीति के गिरते स्तर और भ्रष्टाचार पर बहुत दुखी थे। हमने कहा कि दुखी होने से तो कुछ होने वाला नहीं है, कुछ करना होगा ना। एक साहब ने कहाकि अगर उड़ते हुए जहाज से एक नेता को नदी में गिराया जाए तो इससे " पलूसन " होगा, लेकिन इसी जहाज पर देश के सभी नेताओं को बैठा कर अगर उन्हें ऊपर से नदी में गिरा दिया जाए तो भारतीय राजनीति का " सलूसन " निकल आएगा।

सामान्य माहौल में भी नेताओं के प्रति लोगों का गुस्सा देखकर मैं बहुत हैरान था। कई बार सोचता हूं क्या वाकई देश की लीडरशिप इसी काबिल है कि उन्हें उड़ते जहाज से नदी में गिरा देना चाहिए ? अच्छा ये बातें सुनते सुनते जब मैं थक गया तो बोले बिना रहा नहीं गया, मैने कहाकि इसका मतलब आप सब संसद पर हमले को सही मानते हैं ? क्योंकि अगर हमला कामयाब हो जाता तो देश की लीडरशिप ही तो मारी जाती ! मैं यहीं नहीं रुका, कहा कि अगर संसद पर हमले को आप जायज ठहराते हैं तो हमले के साजिशकर्ता अफजल गुरू की फांसी को गलत मानते होंगे ? फिर तो अफजल का सम्मान होना चाहिए ? बहरहाल इसके बाद लोग चुप हो गए और बात बदल कर हिंदू मुस्लिम वोटों की शुरू हो गई।

बातचीत के दौरान एक साहब ने बढिया किस्सा सुनाया। कहने लगे छत्तीसगढ में चुनाव को देखते हुए राहुल गांधी और नरेन्द्र मोदी जनसंपर्क को निकले। घने जंगल में बसे गांव के एक-एक घर जाकर लोग वोट की अपील कर रहे थे। इसी संपर्क के दौरान दोनों नेता अपने समर्थकों से बिछड़ गए और जंगल में भटक गए। अंधेरा होने को था, अचानक जंगल में ही मोदी और राहुल की मुलाकात हो गई। दोनों मुश्किल में थे, लिहाजा दोनों गले मिले, एक दूसरे की खूब तारीफ की। लेकिन अब दोनों को भूख सता रही थी। पर खाने को कुछ नहीं था। जंगल में किसी तरह रात बीती, सुबह वो फिर रास्ता तलाशने निकले। भूख से दोनों का बुरा हाल था। कुछ दूर चले तो सामने एक मस्जिद दिखाई दी। राहुल गांधी की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उन्होंने मोदी को सलाह दी कि सामने मस्जिद है, आजकल रमजान का मौका है, वो हमें जरूर कुछ खाने पीने को देंगे, बस हम अपना नाम थोड़ा बदल लेते हैं।

मोदी चुपचाप राहुल की बात सुनते रहे, राहुल ने कहा कि मैं अहमद हो जाता हूं आप मोहम्मद बन जाइए। क्या करना है कुछ खाने को तो मिल जाएगा। मोदी उखड़ गए, उन्होंने कहा बिल्कुल नहीं, मैं एक हिंदू राष्ट्रवादी हूं, मैं भूखा रह सकता हूं, सिर्फ खाने के लिए धर्म नहीं बदल सकता। खैर राहुल को भूख बर्दास्त नहीं हो रही थी, कुछ देर बाद दोनों ही मस्जिद पुहंच गए। वहां राहुल ने अपना नाम अहमद हसन बताया और खुश हो गए कि अब कुछ खाने को मिलेगा। मोदी ने अपना पूरा नाम बताया और कहाकि मेरा नाम नरेन्द्र दामोदर भाई मोदी है। मौलाना ने कारिंदों को आवाज देकर बुलाया और कहा कि अरे भाई देखो मोदी साहब आए हैं, इन्हें खाना वाना खिलाइये। राहुल की ओर इशारा करते हुए मौलवी साहब ने कहाकि अहमद हसन साहब आपका तो रोजा होगा, शाम को रोजा इफ्तार कीजिएगा। तब तक आप आराम कीजिए। वैसे ये तो किस्सा है, लेकिन एक खास तबके के वोट के लिए जिस तरह कुछ राजनीतिक दल के नेता लार टपका रहे हैं, कल को उनकी ऐसी ही दुर्गति हो तो हैरानी नहीं होगी।

         

Wednesday, July 10, 2013

फेसबुक पर Like खरीदते हैं मुख्यमंत्री !

कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों का भी बुरा हाल है। क्या करें, क्या ना करें, ये बात उनकी समझ में ही नहीं आ रही है। कामयाबी के लिए राज्य की जनता के दुखदर्द में शामिल हों या फिर सोशल साइट पर "लाइक" की संख्या बढ़ाकर लोकप्रियता के नए पैमाने पर सबसे आगे खड़े हो जाएं, वो ये तय नहीं कर पा रहे हैं। अब कांग्रेसियों ने देखा कि नरेन्द्र मोदी मुख्यमंत्री तो गुजरात के हैं, लेकिन उनकी छवि एक राष्ट्रीय नेता की बन चुकी है, इसमें सोशल नेटवर्किंग साइट्स का अहम योगदान है। इसलिए मोदी की देखा देखी कांग्रेस के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी सोशल साइट्स पर ग्रुप बनवाया, अब  "लाइक्स" की संख्या बढ़ाने के लिए सौदेबाजी पर उतर आए, लेकिन क्या करें, बेचारे अपने ही जाल में फस गए। गहलौत साहब लोकप्रियता खरीदी नहीं जा सकती, समझ में आई बात !

पूरा किस्सा सुन लीजिए , सोशल मीडिया पर जारी सियासत ने राजस्‍थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलौत की खूब फजीहत हो रही है।  आरोप है कि वो अपनी शोहरत यानि लोकप्रियता को बढ़ाने के लिए आधिकारिक फेसबुक पेज के लिए 'लाइक्स खरीदने' में जुट गए हैं। वैसे तो ये काम छोटे मोटे लोग भी करते हैं, इसका फेजबुक पर बकायदा प्राविजन है। अब गहलोत ने अपने फेसबुक पेज का जिम्मा एक अलग हाईटेक टीम के हवाले कर रखा है। बताते हैं कि इस उनके इस पेज पर 1 जून तक 1,69,077 लाइक्स मिले हुए थे। इसमें भी ज्यदातर लाइक्स 5 मई वाले हफ्ते में आए हुए हैं।

अब हैरानी इस बात को लेकर है कि महज एक महीने यानि 30 जून तक ये आंकड़ा उछलकर 2,14,639 पर कैसे पहुंच गया ? इतना ही नहीं पहले मसलन एक जून तक गहलौत की " मोस्ट पापुलर सिटी " यानि गहलौत साहब कहां सबसे ज्यादा लोकप्रिय हैं, कहां उनके ज्यादा फालोवर हैं,  ये सब जयपुर था। लेकिन अचानक "लाइक्स" की संख्या बढ़ने के बाद उनकी पापुलेरिटी जयपुर के बजाए " इंस्ताबुल " हो गया, जो तुर्की की राजधानी है। हाहाहहाहाहा। मतलब भाई गहलौत जी अब तुर्की में ज्यादा लोकप्रिय हो गए हैं। 

अब विरोधी भी तो मौके की तलाश में रहते है। बीजेपी नेता किरण ने मुख्यमंत्री पर सवाल खड़े कर दिए।  उनका कहना है कि गहलोत की आखिर इंस्ताबुल में इतनी चर्चा कैसे हो सकती है ? उन्होंने आरोप लगाया कि ये लाइक्स इंस्ताबुल की किसी आईटी कंपनी से खरीदे गए हैं। भाजपा का कहना है कि कांग्रेस सोशल मीडिया पर भी गलत छवि पेश कर रही है। कहते हैं ना कि हर जगह टांग नहीं फंसाना चाहिए, अब मुख्यमंत्री ठहरे ठेठ राजस्थानी, कंपूटर को उन्होंने कभी हाथ नहीं लगाया होगा, फून में भी बहुत सामान्य वाला इस्तेमाल करते हैं। अब टाई लगाकर उन्हें आधुनिक बनाने की कोशिश की जा रही है। भाई गहलौत जी आप जैसे हैं वैसे ही ठीक हैं, कहीं टाई के चक्कर में पगड़ी में उतर जाए ?







Monday, July 1, 2013

जलसमाधि दे दो ऐसे मुख्यमंत्री को !

उत्तराखंड त्रासदी पर बाकी बातें बाद में ! मुझे लगता है कि नाराज देवी देवताओं को मनाने के लिए सबसे पहले विधि-विधान से पूजा पाठ कर उत्तराखंड के लापरवाह, निकम्मे मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को जल-समाधि दे दी जानी चाहिए। इतना ही नहीं राहत कार्य में व्यवधान पहुंचाने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी को भी सख्त सजा जरूरी है। इन दोनों को अन्न-जल त्यागने पर विवश कर इन्हें इनके आलीशान बंगलों से बाहर किसी पहाड़ी पर भेजा जाना चाहिए, जो साल भर घनघोर पहाड़ी पर कठिन तपस्या के जरिए अपने किए पापकर्मों से मुक्ति के लिए मार्ग प्रशस्त करें। उत्तराखंड सरकार के बाकी मंत्रियों को क्षतिग्रस्त सड़को को दुरुस्त करने के काम में लगा दिया जाना चाहिए। इसके अलावा जिस अफसर ने मौसम विभाग की चेतावनी को गंभीरता से नहीं लिया, उस अफसर को जिंदा जमीन में गाड दिया जाए तो भी ये सजा कम है। मेरा तो ये भी मानना है कि उत्तराखंड में जिस तरह भीषण तबाही हुई है, उसे फिर पटरी पर लाने के लिए दो कौड़ी के नेताओं की कोई जरूरत नहीं है, वहां सेना को ही पुनर्वास का काम भी सौंप दिया जाए, वरना ये उचक्के नेता तो पीड़ितों के लिए मिलने वाली सहायता राशि में भी लूटमार करने से चूकने वाले नहीं है। 

देवभूमि में प्रकृति ने जो कहर ढाया, मैं समझता हूं कि उसे रोकना किसी के बस की बात नहीं थी। लेकिन उसके असर को कम करना, होने वाले नुकसान को कम करना, जान माल की क्षति को कम करना, प्रभावकारी ढंग से सहायता पहुंचा कर लोगों को तत्काल राहत पहुंचाना ये सब काम हो सकता था, जो नहीं हो सका। नतीजा क्या हुआ ? लगभग एक हजार लोग मारे जा चुके हैं, चार हजार के करीब लापता हैं। चूंकि इनके शव बरामद नहीं हुए हैं, इसलिए तकनीकि रूप से लापता कहा जा रहा है। मैं तो कहता हूं कि अब 15 दिन से ज्यादा समय हो चुके हैं, मान लिया जाना चाहिए कि इनकी भी मौत हो चुकी है। कई सौ गांव का अस्तित्व खत्म हो गया है, पांच सौ से ज्यादा सड़कें बह गई हैं, बिजली, पानी और संचार सेवा पूरे इलाके में लगभग ठप है। बताया जा रहा है कि तबाही वाले इलाके में जहां तहां लोगों के शव अभी भी पडे हुए हैं। हालाकि अब उनका अंतिम संस्कार किया जा रहा है। 

मैने स्व. हेमवती नंदन बहुगुणा को बहुत करीब से देखा है, उन्हें खूब सुना है, उनकी कार्यशैली देखी है। लेकिन उनका बेटा इस कदर नालायक, अक्षम, झूठा, लालची, लापरवाह और निकम्मा होगा, कम से कम मैने तो सपने में भी नहीं सोचा था। पता चला है कि जिस वक्त उत्तराखंड पर ये कहर फूटा, उस दौरान मुख्यमंत्री अपने निर्वाचन क्षेत्र सितारगंज में एक रूसी कंपनी को सौ एकड जमीन दिए जाने के एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर करने वाले अपने खास अधिकारी की पीठ थपथपा रहे थे।  उन्हें कुदरत के कहर की भनक तक नहीं लगी थी। जब उन्हें इस घटना की जानकारी हुई तो उन्होंने प्रभावित इलाके में जाना भी ठीक नहीं समझा, उन्होंने ये जानने की भी कोशिश नहीं की कि वहां कितना नुकसान हुआ है और कितने श्रद्धालु केदारनाथ के दुर्गम रास्तों में जीवन और मौत से जूझ रहे हैं। मूर्ख मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा अपने दो साथी मंत्रियों को साथ लेकर दिल्ली आ धमके। जानते हैं किस लिए, इसलिए कि उत्तराखंड में भारी तबाही हुई है, उन्हें पैकेज यानि आर्थिक मदद दी जाए। 

इस दौरान बेवकूफ मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री से ये मांग नहीं की कि दुर्गम इलाके में कई हजार श्रद्धालु फंसे हुए हैं, उन्हें बाहर निकालने के लिए सौ हेलीकाप्टर तुरंत भेजे जाएं। ये पट्ठा यहां दिल्ली में पैसे के लिए गिड़गिड़ाता रहा, जबकि वहां श्रद्धालु दम तोड़ते जा रहे थे। ये पैसे के लिए इतने लालायित थे कि अपनी ही सरकार पर दबाव बनाने के लिए विभिन्न न्यूज चैनलों पर जाकर घंटों वहां के हालात के बारे में बक-बक करने लगे, जबकि इन्होंने प्रभावित इलाकों का दौरा तक नहीं किया था। मुख्यमंत्री दिल्ली में जब पैसे की मांग को लेकर समय बिता रहे थे, उसी दौरान उत्तराखंड के ही कुछ वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं ने पार्टी आलाकमान को हालात की गंभीरता के बारे में बताया और साफ किया कि इसमें तुरंत केंद्रीय नेतृत्व को हस्तक्षेप करने की जरूरत है, क्योंकि मुख्यमंत्री में ऐसे मामलों से निपटने की ना क्षमता है और ना ही मजबूत  इच्छाशक्ति। बताते हैं कि इसके बाद कांग्रेस आलाकमान सख्त हुआ तो बहुगुणा दिल्ली छोड़ कर देहरादून रवाना हुए। 

बहुगुणा की निर्लज्जता की खबरें वाकई इंसानियत को शर्मसार करने वाली हैं। जानते हैं 20 जून के आसपास मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को कुछ अधिकारियों के साथ स्विट्जरलैंड जाना था। 16 जून को ये हादसा हो गया, इसके बाद भी मुख्यमंत्री अपना विदेश दौरा रद्द नहीं करना चाहते थे, उन्होंने विदेश मंत्रालय और पार्टी आलाकमान को दौरा रद्द करने की कोई जानकारी नहीं दी। इधर दौरा रद्द होने की कोई जानकारी ना मिलने के कारण विदेश मंत्रालय मुख्यमंत्री की यात्रा की तैयारियों में लगा रहा। बताया जा रहा है कि इस मामले में भी उत्तराखंड के कांग्रेस नेताओं ने पार्टी हाईकमान से शिकायत की और कहाकि वैसे मुख्यमंत्री का देहरादून में रहना ना रहना कोई मायने नहीं रखता, फिर भी अगर वो स्विट्जरलैंड गए तो पार्टी की छवि खराब होगी। इसलिए उनका दौरान रद्द किया जाना चाहिए। बताते हैं ये जानकारी होने के बाद आलाकमान ने बहुगुणा से सख्त नाराजगी जाहिर की, तब जाकर दौरा रद्द किए जाने की जानकारी विदेश मंत्रालय को भेजी गई। ऐसे मुख्यमंत्री को अगर लोग कह रहे हैं कि नालायक है, कह रहे हैं कि अक्षम है, कह रहे हैं कि लापरवाह है, तो मुझे नहीं लगता कि कोई गलत कह रहा है। अब कोई अक्षम, लापरवाह, नालायक है तो इसकी कानून में तो कोई सजा है ही नहीं, लिहाजा इन्हें धार्मिक रीति-रिवाज ठिकाने लगाने के लिए जल समाधि ही सबसे बेहतर उपाय है। 

वैसे लापरवाह सिर्फ मुख्यमंत्री को कहा जाए तो ये भी बेमानी होगी। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और यूपीए सोनिया गांधी की वजह से भी वहां राहत कार्य बाधित हुआ। वहां से जो जानकारी मिली अगर वो सही है तो ये केंद्र सरकार के लिए भी कम शर्मनाक नही है। पता चला है कि उत्तराखंड में जहां-तहां फंसे श्रद्धालुओं की सहायता के लिए लगाए गए सेना और प्राईवेट हेलीकाप्टर काफी देर तक उड़ान नहीं भर पाए। कारण मौसम की खराबी नहीं थी, बताया गया कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी इलाके का हवाई सर्वेक्षण कर तबाही का मंजर देख रही थीं। इसलिए सुरक्षा कारणों से काफी समय तक दूसरे हेलीकाप्टर उडान नहीं भर सके। अरे भाई मनमोहन और सोनिया जी आप के हवाई सर्वेक्षण से क्या फर्क पड़ने वाला है। अफसरों की टीम भेज देते, वो नुकसान का सही आकलन भी कर पाते। अब इसके लिए तो मेरे ख्याल से ये दोनों भी बराबर की सजा के हकदार हैं।

अब प्रधानमंत्री के हवाई सर्वेक्षण करने के खिलाफ भी कोई कानून तो है नहीं, अरे भाई मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री हैं वो कहीं का, कभी भी हवाई सर्वेक्षण कर सकते हैं। लेकिन उत्तराखंड में राहत कार्य में जो बाधा पहुंची, उस मामले में सजा तो दी ही जानी चाहिए। इसीलिए मैं कह रहा हूं कि धार्मिक तौर पर इन दोनों को अन्न-जल त्याग का संकल्प दिलाकर पहाड़ी पर छोड़ दिया जाए। इन्होंने मानव जीवन का अनादर किया है, इसलिए इन पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए कि साल भर तक ये किसी व्यक्ति की सूरत भी नहीं देख सकेंगे। सच में ये दोनों भी कुछ इसी तरह की सख्त कार्रवाई के हकदार हैं। 

सोशल साइट पर कुछ बेपढ़े लोगों ने मौसम विभाग के खिलाफ अभियान चला रखा है। मौसम विभाग के खिलाफ जोक्स बनाए जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि जब मौसम विभाग के अफसर बारिश की भविष्यवाणी करते हैं तो उनकी पत्नी भी सूखने के लिए बाहर डाले गए कपड़ों को नहीं हटाती है, फिर देश के दूसरे लोग भला उनकी भविष्यवाणी पर भरोसा कैसे कर सकते हैं ? मैं तो यही कहूंगा कि जो भरोसा नहीं करते हैं वो मूर्ख हैं। मौसम विभाग की भविष्यवाणी को सड़क छाप ज्योतिष की भविष्यवाणी से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। जम्मू कश्मीर में अमरनाथ यात्रा अक्सर इसलिए रोक दी जाती है कि मौसम विभाग भविष्यवाणी करता है कि मौसम ठीक नहीं रहेगा। वहां राज्य सरकार और मौसम विभाग का तालमेल बहुत बेहतर है। यही वजह है कि अमरनाथ में ऐसे हादसे काफी कम होते हैं। इसलिए मौसम विभाग की चेतावनी की एकदम से अनदेखी करना वाकई गैरजिम्मेदारी का काम है। अब उत्तराखंड की बात करें। यहां मौसम विभाग ने बकायदा दो दिन पहले एक लिखित चेतावनी राज्य सरकार के वरिष्ठ अफसरों को भेजा। इसमें यहां तक साफ किया गया कि मौसम खराब होने वाला है, इसलिए यात्रा रोक दी जाए। लेकिन राज्य सरकार ने इस चेतावनी पर बिल्कुल गौर ही नहीं किया। मेरे लिए तो ऐसे अफसर के लिए धरती पर कोई जगह नहीं है, मै तो उसे जिंदा जमीन में गाड़ने का हुक्म दे दूं। फिर भी मैं उत्तराखंड सरकार से ये जानना चाहता हूं कि आखिर इस सबसे बड़ी लापरवाही के लिए जिम्मेदार अफसर के खिलाफ अभी तक कोई कार्रवाई क्यों नहीं की गई ? 

अब आखिरी बात ! उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पर अब भरोसा भी नहीं किया जा सकता। क्योंकि इतनी बड़ी आपदा के बावजूद वो झूठ पर झूठ बोलते जा रहे हैं। एक दिन मुख्यमंत्री ने खुद ही कहाकि प्रभावित इलाके में संचार प्रणाली ठप हो गई है। अगले दिन बोले कि वो प्रभावित इलाके के जिलाधिकारियों के साथ लगातार वीडियो कान्फ्रेंस के जरिए आदेश दे रहे हैं। संचार व्यवस्था ठप होने पर भी मुख्यमंत्री की वीडियो कान्फ्रेंस चालू है, वाह रे झूठे मुख्यमंत्री ! यही वजह है कि अब इन नेताओं पर हमें क्या किसी को भरोसा नहीं रह गया है। देश को लगता है कि बहुगुणा की नजर राहत कार्य के लिए मिलने वाली सहायता राशि पर है। मेरा सुझाव है कि जिस तरह कठिन हालात में देश की सेना ने लोगों की मदद की है, वहां पुनर्वास का काम भी सेना के हवाले कर दिया जाना चाहिए। एक तो पैसे का सदुपयोग होगा, दूसरे काम जल्दी हो जाएगा, ऐसा मेरा विश्वास है। इन नेताओं से खासतौर पर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री की कार्यप्रणाली से तो मुझे घिन्न आ रही है।

चलते - चलते : इस घटना को अब 15 दिन बीत चुके हैं। अभी भी वहां फंसे हुए अंतिम व्यक्ति को निकाला नहीं जा सका है। मैं पूछना चाहता हूं कि हमारे पास ऐसी आपदाओं से निपटने के लिए आखिर क्या तैयारी है। अब सरकार पर सवाल तो उठेगा ही, कांग्रेस ये कह कर नहीं बच सकती कि इस मुद्दे पर राजनीति नहीं होनी चाहिए।  मैं पूरी जिम्मेदारी से कहता हूं कि इस पर खूब राजनीति होनी चाहिए, जिससे आने वाले समय में ऐसा कोई मैकेनिजम बन सके, जिससे आपदा के दौरान तुरंत जरूरतमंदों को राहत मिल सके।